माइक्रो प्लानिंग और डेथ एनालिसिस से  रोका जा सकता है महामारी को फैलने से 


  • ••••स्वास्थ्य विभाग ने मलेरिया, डेंगू, कालरा पर काबू पाया था इसी प्लानिंग से                                       ,,, कैसे रुकेगी महामारी,,,,, आइए इसका हम देते हैं जवाब

  • इंदौर( कीर्ति राणा)।तेजी से फैलने वाले कोरोना की गति बाधित करने में कलेक्टर मनीष सिंह ने एक हद तक सफलता पाई है लेकिन यदि स्वास्थ्य विभाग में वर्षों से चली आ रही माइक्रो प्लानिंग और हर मरीज की मौत के कारणों (डेथ एनालिसिस) की प्रक्रिया बंद नहीं हुई होती तो तंग और संवेदनशील बस्तियों में बढ़ने वाले कोरोना के मरीजों की संख्या इतनी नहीं बढ़ती। 
    शहर जब 69 वार्डों में फैला हुआ था तब स्वास्थ्य विभाग माइक्रो प्लानिंग मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं को अंजाम देता था। इस प्लानिंग के तहत हर वार्ड में एक इंचार्ज मेडिकल ऑफिसर तैनात था जो सुबह हॉस्पिटल तो शाम को फील्ड (अपने वार्ड) में मलेरिया, डेंगू, कालरा आदि से पीड़ित मरीजों की जानकारी रखता था।इस काम में सहयोग के लिए महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता आदि की टीम रहती थी। मेडिकल ऑफिसर प्रति सप्ताह सुपरवायजर को अपनी रिपोर्ट देता था। 69 वार्डों से प्रति सप्ताह प्राप्त होने वाली रिपोर्ट के आधार पर प्रोग्राम ऑफिसर मॉनिटरिंग करते थे।उन वार्डों पर अधिक फोकस, अतिरिक्त स्वास्थ्य अमला लगा कर काम किया जाता था जिन वार्डों में उक्त बीमारी से पीड़ित मरीजों का आंकड़ा अधिक आता था।
    तब शहर के 69 वार्डों में 535 के करीब स्लम एरिया (करीब 8 लाख जनसंख्या) रजिस्टर्ड थी। अब 85 वार्ड होने के बाद स्लम एरिया बढ़ने के साथ ही इन क्षेत्रों की आबादी भी बढ़कर अनुमानित 10 लाख हो गई है लेकिन तब की तरह हेल्थ डिपार्टमेंट वाली माइक्रो प्लानिंग अब प्रभावी नहीं रह गई।स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्र मानते हैं कि माइक्रो प्लानिंग के अभाव में ही संवेदनशील क्षेत्रों, ऐसी बस्तियों की पहचान समय रहते नहीं हो सकी। एएनएम, स्टॉफ नर्स, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता, आयएमए सहित हेल्थ के क्षेत्र में कार्यरत एनजीओ आदि इन सब के सामूहिक प्रयास बहुत पहले से शुरु हो जाते तो अर्ली डिटेक्शन के साथ ही सेंपल कलेक्शन के काम में विलंब नहीं होता।लिए जाने वाले सेंपल की रिपोर्ट अधिकतम 48 घंटे में प्राप्त होने लगती तो संदिग्ध मरीजों से अन्य के संक्रमित होने के खतरे पर भी अंकुश लग जाता। सेंपल लेने के बाद रिपोर्ट जल्दी नहीं मिलना, मरीज की मौत के बाद रिपोर्ट में कोरोना के लक्षण आना जैसे कारणों से भी नियंत्रण में तेजी नहीं आ सकी। 
    ‘पहले हर डेथ का एनालिसिस होता था’
    कोरोना महामारी का आतंक तो अभी है इससे पहले इंदौर में कालरा से 125 मौतें हो चुकी हैं, उस दौरान कालरा से होने वाली मौतों पर नियंत्रण में डेथ एनालिसिस मददगार साबित हुआ था। पूर्व क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य (मप्र) डॉ शरद पंडित ने
     ‘प्रजातंत्र ‘से चर्चा में बताया प्रचलित बीमारी से होने वाली मौत पर तब इंदौर में हर डेथ का एनालिसिस करने के लिए एक टीम काम करती थी। इस टीम में मेडिसिन विभाग, कम्युनिटी मेडिसिन, जेडी ऑफिस से डिप्टी डायरेक्टर, सीएमएचओ तथा आयएमए का मेंबर ऐसे पांच सदस्यों की टीम मौत के कारणों का विश्लेषण करती थी। पेशेंट किस एरिया का निवासी है, किन लक्षणों से बीमारी का पता चला,अस्पताल में कब दाखिल हुआ, आईसीयू में कब, वेंटीलेटर पर कब लिया, कौन-कौन सी दवाइयां दी, किस दवाई का क्या असर रहा, मौत कब हुई, मौत से पहले क्या लक्षण रहे आदि एनालिसिस कर केस हिस्ट्री तैयार की जाती थी।माइक्रो प्लानिंग और डेथ एनालिसिस से किसी भी बीमारी को महामारी जैसा रूप लेने से पहले काबू करने में मदद मिल जाती थी।कोरोना मामले में काबू की दिशा में इस तरह के प्रयास किए जाएं तो अगला कोई संकट आने से पहले मजबूत रोकथाम हो सकती है।(श्री कीर्ति राणाजी देश के जानेे-माने पत्रकार और चिंतक है, दैनिक मालव क्रांति के निवेदन पर वे अपने चुनिंदा लेख और समाचार उपलब्ध करा रहे हैं )


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