कोरोना का प्रलाप क्यों,,,,,और कब तक?,,,,,,,,,,महाभारत और कामगीता !

आज 'प्रजातंत्र' में 'गुनो भई साधो !'


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कहते हैं मन अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं के बीच विचारों की हलचल के कारण विचलित रहता है। एक छोर पर अतीत, दूसरे पर भविष्य और इन दोनों के बीच विचारों के प्रवाह में हिचकोलें खाता बेचैन मन! जो सदैव अपने वर्तमान के सहज स्वीकार से कोसों दूर अस्थिर रहकर जीवन को असहज बना देता है। एक ओर हम 'जो भी है, बस यही इक पल है। आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू' टाइप काल-महिमा के गीत गुनगुनाते हैं और दूसरी तरफ़ खुद अपने जीवन को ज़हर की तरह जीते-पीते हैं। तब ज़रा विचारिए, जिम्मेदार कौन है? हम या मन!


 


कोरोनाजन्य इस अकाट्य नैराश्य काल में भी तो यही हो रहा है। दुनिया में संक्रमितों की संख्या एक करोड़ हो गई है और दूसरी तरफ अनलॉक के बीच जीवन बन्द बिलों से बाहर झाँक रहा है। इस सबके बीच एक ओर हम अतीत के उन दिनों को याद में डूबे हैं जब अपने दोस्तों के साथ गर्मजोशी से गले मिलते थे, समूहों में घूमते थे, पार्टियां करते थे और सजधज कर जहां-तहां मनमाने मंडराते थे। अभी जब उन सब मौज-मस्तियों का निषेध-सा है तो हम उस अतीत में खोए हुए हैं, उसे लौटाना चाह रहे हैं। दूसरी ओर शुरू हुई व्यावसायिक गतिविधियों के बीच भविष्य में क्या होगा, यह भय भीतर ही भीतर सभी को खाए जा रहा है। यह जानते हुए कि पल का भरोसा नहीं तब भी आने वाले कल की चिंता हमें पलभर चैन से बैठने नहीं दे रही। चूंकि कोई रास्ता सूझ नहीं रहा, इसलिए हम आदतन अपने वर्तमान को कोसते हुए अपनी भड़ास इस महामारी पर निकाल रहे हैं। 


 


माना जा सकता है कि एक महामारी ने बीते करीब पाँच माह से हमारे तन, मन, धन, जीवन सबको प्रभावित कर हमें सन्तप्त कर दिया है मगर जब यह नहीं थी कि तब हम सुखी थे? क्या तब हम पूरी तरह आनन्द में थे? हर्ष-विषाद से परे, मोह-माया, छल-कपट, प्रपञ्च-प्रतिस्पर्धा से दूर थे? क्या तब केवल 'सुख' ही था और हम सबका मन पूरी तरह वैसा ही 'शांत' था जैसा आज कोरोना का संकट टल जाने पर हम उसके शांत होने की उम्मीद कर रहे हैं?


 


इन सवालों के जवाब अपने आप से पूछिए तो पाएंगे कि न हम कोरोना आने से पहले सुखी और शांत थे, न आज कोरोना काल में हैं और आने वाले कल में जब सारा संसार सम्पूर्णतः पूर्ववत रंगीन हो उठेगा, तब रहेंगे। बीते कल के अलग झगड़े थे, आज का अपना तनाव है और आने वाले कल के कुछ अलग ही द्वन्द्व होंगे। तब 'मैं बहुत दुःखी हूँ' की चीख-पुकार के बीच 'अब मैं क्या करूँ' और कैसे 'मन शांत करूँ' की समस्या के समाधान की खोज में मुझे रह-रहकर महाभारत याद आ जाती है।


 


महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में श्रीकृष्ण ने इस स्थिति को दुःख-विभ्रम कहा है। जिसका सीधा-सा अर्थ है हर अवस्था में दुःखी रहना। फिर दुःख हो या सुख, महामारी का संकट हो या न हो, दुःख जिनका स्वभाव बन जाता है, वे सुख मिलने पर भी दुःख का रोना रोने से बाज़ नहीं आते। महाकाव्य के इस पर्व की कथा के अनुसार युद्ध में विजयी होने के बाद भी युधिष्ठिर प्रसन्न नहीं थे। अपने ही भाइयों को मारकर राज्य पाने की ग्लानि से भरे थे। जिस दिन महामना भीष्म ने देह त्यागी, उस दिन युधिष्ठिर ने भी अपना धैर्य मानो त्याग दिया। इतना कि महर्षि वेदव्यास तो खीझकर बोल पड़े कि 'हम लोग क्यों हैं, जो तुम्हें बारम्बार समझाते हैं किंतु बालकोचित अविवेक के कारण तुम्हारा मोह है कि दूर ही नहीं होता। दुःख का प्रलाप रुकता ही नहीं!'


 


आश्वमेधिक पर्व का बारहवाँ अध्याय प्रमाण है कि तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को मन पर विजय का आदेश दिया और अगले अध्याय में कामनाओं का निग्रह सिखाने वाली अद्भत 'कामगीता' का उपदेश दिया। जो कर्म की उपदेशक प्रसिद्ध श्रीमद्भागवतगीता से इतर मन पर विजय के सार सूत्र प्रदान करती है। श्रीकृष्ण की वाणी का सार यह है कि 'हर्ष से शोक बाधित होता है और शोक से हर्ष। कोई दुःख में पड़कर सुख को याद करता है और कोई सुखी होकर भी दुःख की याद में जीता है। यही दुःख-विभ्रम है। 


 


सबसे महत्वपूर्ण ये कि यह कामनाओं से भरे हमारे मन में सदैव चलने वाला युद्ध है। जिसमें हम सर्वथा अकेले है, कोई साथ नहीं दे सकता। 'यत्र नैव शरै: कार्ये न भृत्यैर्न च बन्धुभि:। आत्मनैकन योद्धव्यं तत् ते युद्धमुपस्थितम्।' अर्थात हे युधिष्ठिर! मन के साथ होने वाले इस युद्ध में बाणों, सेवकों और भाई-बन्धुओं का काम नहीं है। मन का यह युद्ध तो आपको अकेले ही लड़ना है और वह युद्ध सामने उपस्थित है।'


 


तब भगवान ने कहा, 'कामात्मानं न प्रशंसन्ति लोके नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्ति:। सर्वे कामा मनसोSङ्गप्रभूता यान् पण्डिता: संहरते विचिन्त्य।' अर्थात जिसका मन कामनाओं में आसक्त है, उसकी संसार के लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति ( दुःख ) बिना कामना के नहीं होती और समस्त कामनाएं मन से ही प्रकट होती है। समझदार ( विद्वान ) व्यक्ति कामनाओं को दुःख का कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं।


 


साधो! मैं देखता हूँ यही दुःख-विभ्रम के बीच प्रत्येक व्यक्ति का मन 'कुरुक्षेत्र' बना हुआ है और बगैर साथी-सहयोगी के सब इस युद्ध में स्वयं को अकेला पाकर हड़बड़ाए हुए हैं। तब इस युद्ध में जय के लिए श्रीकृष्ण का सुझाया सूत्र ही काम आना है। जिसका सार है 'कामनाओं का त्याग'। कुछ खो जाने के भय और आशंका के बीच इस प्रयोग को किये बिना दुःख और चिंता से मुक्ति सम्भव नहीं है। यद्यपि इसे साधना अत्यंत कठिन है लेकिन इसके सिवाय मन को शांत करने का दूसरा उपाय न था, न है और न कभी हो सकेगा।


लेखक श्री विवेक चौरसिया देश के प्रसिद्ध चिंतक और जाने-माने पत्रकार हैं


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