कोरोना काल: आस्था के केंद्र और ‘आम’ और ‘खास’ के मापदंड...



बात उज्जयिनी की हो रही है और मुद्दा भी नया नहीं है: आस्था के केन्द्रों से आम लोगों को दूर करने के पीछे आखिर औचित्य क्या है? संदर्भ आज यानी नागपंचमी का ही है! 


 देश के 12 ‘ज्योतिर्लिंग’ मंदिरों में शुमार महाकालेश्वर मंदिर ही संभवत: इस सार्वभौम धुरी पर एक ऐसा शक्तिपुंज है जहां पाताल लोक में स्वयं कालों के काल विराजित हैं और पृथ्वी (सूर्य) लोक पर ओंकारेश्वर जी आस्था के केंद्र बिन्दु हैं। सबसे शीर्ष अर्थात आकाश लोक में नागचन्द्रेश्वर जी विराजित हैं! नागचन्द्रेश्वर मंदिर में दीवार पर स्थित नाग महाराज और उनका पूरा परिवार और अंदर विराजमान नागलिंग के दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार ही होते हैं वो भी नागपंचमी पर! इस धरा का महात्म्य इसीलिए युगांतकारी रहा है कि समूचे नभ यानी पृथ्वी, आकाश और पाताल में बाबा महाकाल की सत्ता अशलांघनीय है। महाकालेश्वर मंदिर के शिखर से गुजरती कर्क रेखा और उसके खगोलीय महत्व को आज भी पूरे विश्व पटल पर ‘Old Greenwich’ की मान्यता मिली हुई है! 


 मगर जब शुक्रवार की शाम से महाकालेश्वर मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं का जो तांता हमेशा बने रहता है वो गायब मिला तो चर्चाएँ शुरू हो गईं! जो दर्शनार्थी बाहरी स्थानों से बड़ी संख्या में मंदिरों की आस्था-स्थली उज्जैन पहुंचे, वो काफी निराश दिखाई दिए! और तो और स्थानीय भक्तों में भी घोर आक्रोश देखा गया! बहरहाल, सभी ने इस बात पर धैर्य धारण कर लिया कि चूंकि मामला वैश्विक आपदा कोरोना संक्रमण से जुड़ा है, तो हर लिहाज से अपने-आप को सुरक्षित करते हुए स्थानीय प्रशासन को सहयोग प्रदान किया जाए!...


 


 मगर हद तो तब हो गई जब इन्हीं प्रशासनिक मुलाजिमों ने कथित नेताओं और उनके चमचों को धड़ाधड़ नागचन्द्रेश्वर मंदिर में प्रोटोकॉल देना शुरू कर दिया! इन सबको बकायदा ऊपर ले जाकर पूजन-अर्चन करने की खुली छूट भी दे दी गई!...ये सब होता देख, duty पर लगाए गए पुलिसवालों, राजस्व अमले, कार्यपालिक दंडाधिकारियों सहित महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के कर्मचारियों ने भी प्रोटोकॉल की आड़ में वो सब कर डाला, जिसके कारण मंदिर को व्यावसायिक केंद्र बनाने को लेकर आम लोगों में काफी उबाल रहा है! इन सब कुत्सित गतिविधियों को बहुतेरे लोगों ने ऑनलाइन भी देख लिया, क्योंकि प्रशासन ने ही इस बार virtual दर्शन को बढ़ावा दिया था! 


 


 प्रश्नों पर ध्यान दीजिए: (1) उज्जैन, मध्य प्रदेश और भारतवर्ष सहित अधिकांश विश्व में जब कोरोना काल कुलांचे मार रहा है, तो उज्जैन के नागचन्द्रेश्वर मंदिर में परंपरा के नाम पर जनभावनाओं से इस तरह का खिलवाड़ क्यों किया गया? (2) अगर परंपरा के नाम पर औपचारिकताएँ ही करनी थीं तो बड़ी संख्या में पुलिसवालों, राजस्व अमले, कार्यपालिक दंडाधिकारियों सहित महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति के कर्मचारियों को क्यों तैनात किया गया? (3) जब आप व्यवस्था बनाने की कोशिश ही कर रहे थे तो श्रद्धालुओं को दर्शन से क्यों वंचित किया गया? (4) कौन से कानून, अधिनियम, प्रबंध, उपबंध में ये दर्ज है कि विश्व महामारी में कुछ उच्चाधिकार प्राप्त सज्जन सपत्नीक सरकारी खर्चे पर लंबी अवधि तक उस मंदिर में पूजन-अर्चन करने के पात्र होंगे, जो वर्ष में सिर्फ एक बार खुलता है और वो भी 24 घंटे के लिए? (5) दर्जनों समर्थकों के साथ धक्का-मुक्की के बीच ‘मेरे-मेरे’ दर्शनों के लिए लालायित भाई लोगों को प्रोटोकॉल देना किस मापदंड से उचित कहा जा सकता है? (6) क्या इन सब हरकतों से आस्था के केंद्र मजबूत होते हैं? (7) विकास दुबे जैसे दरिंदे को नकारते हुए क्या आफत के समय में उस आम आदमी के लिए ऐसा कोई रास्ता बनाया जा सकता है कि वो हमारे इस पवित्र केंद्र पर कोई अर्जी तो लगा सके? (8) कोरोना के नाम पर आम लोगों को आस्था केंद्र से दूर कर देना कौन-सी व्यवस्था को suit करता है? 


 


 मैं तो शायद शिथिल भी कर दिया जाऊं, पर कलमवीर मुझे तारीखों के साथ बता रहे हैं कि जब कोरोना नहीं भी था तब इसी वीआईपी संस्कृति के चलते उज्जैन के इसी महाकालेश्वर मंदिर में इसी श्रावण मास में 24 साल पहले एक भीषण घटनाक्रम हुआ था, जिसने सरकार और उसके मंत्री-संत्री सहित अनेक नेताओं और अफसरों के ताजिये ठंडे कर दिए थे....!!!


#niruktbhargava#Ujjain#mahakaleshwar temple#President of India#Prime Minister of India#CJI#Akhil Bharatiya Akhada Parishad#All shankaracharyas#all heads of 13 akhadas#all mahamandleshwars of Shaiva Sampradaya#WHO#Cm, MP#CS, MP#LoP, MP#(श्री निरुक्त भार्गव की फेसबुक वॉल से साभार)                           श्री भार्गव  का पत्रकारिता के क्षेत्र में पिछले 25 वर्षों से एक जाना पहचाना नाम है।


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