जब चार करोड़ रुपये प्रतिमाह इलाज़ के लिए देकर भी कॉलेज प्रबंधन अपनी काली करतूतों से बाज़ न आया तब जाकर अपनी नाक बचाने के लिए कलेक्टर को कुर्बान करने का मुहूर्त निकाला गया

अभी नकेल कसी है, न्याय बाक़ी है!


कोरोना की रोकथाम में फिसड्डी साबित हुए कलेक्टर की बलि लेकर सूबे के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और सत्तारूढ़ भाजपा के स्थानीय नेता यदि इस मुग़ालते में हैं कि उनके पाप इतने भर से धुल जाएंगे तो यह उनकी भूल है। इसलिए कि जिले में 40 बेकसूरों की मौत से जिन घरों में आज मातम फैला है, उन घरों से उठती बद्दुआएं इस बेवकूफ़, बददिमाग़, बेशर्म, बेरहम और बेपरवाह निज़ाम पर अपना असर छोड़े बगैर फ़िज़ा से फ़ना नहीं हो सकेगी। क़ायदे से अभी सुस्त प्रशासन को चुस्त कलेक्टर आशीषसिंह देकर व्यवस्था की 'नकेल' कसी गई हैं, मृतकों का न्याय शेष है।


हैरान हूँ कि कलेक्टर को बदले जाने के बाद सत्तापक्ष के नेता इस तरह जश्न मना रहे हैं मानो सबने मिलकर कोरोना को जिलाबदर कर दिया हो। अभी जबकि कोरोना गली-गली मौत बनकर घूम रहा है, कलेक्टर की कुर्बानी लेकर सुकून की साँस लेते इन नेताओं का थोथा सन्तोष प्रदर्शन आम जनता का दुःख और गुस्सा ही बढ़ा रहा है। कितने शर्म की बात है कि उज्जैन में मृत्यु दर देश में सर्वाधिक 20 फ़ीसदी तक पहुँच गई तब जाकर इन महानुभावों को यह भान हुआ कि कलेक्टर को बदला जाना चाहिए। क्या प्रदेश सरकार के मुखिया को नोएडा में योगी की कार्रवाई तब याद नहीं आई जब मौतों का आँकड़ा कम था? क्या कोरोना के कदम रखते ही इंदौर में कलेक्टर बदलने वाले मुख्यमंत्री भूल गए कि उज्जैन भी इसी सूबे का एक महत्वपूर्ण शहर/जिला है और यहाँ भी वहीं इंसान बसते हैं जो कोरोना की मार से मारे जा सकते हैं?


सच तो यह है कि अपने ही दल के नेताओं को फ़ायदा पहुँचाने और आरडी गार्डी को मिले माल में कमीशनखोरी की ज़िद में आम लोग मरने दिए गए। 500 करोड़ खर्च कर सिंहस्थ में बनाए गए चरक अस्पताल को दरकिनार कर पहले मेडिकल कॉलेज को रेड अस्पताल बनाया गया और फिर धन के लोभी कॉलेज संचालकों की गैरजरूरी मांगों के आगे घुटनें टेके गए। जब चार करोड़ रुपये प्रतिमाह इलाज़ के लिए देकर भी कॉलेज प्रबंधन अपनी काली करतूतों से बाज़ न आया तब जाकर अपनी नाक बचाने के लिए कलेक्टर को कुर्बान करने का मुहूर्त निकाला गया


उज्जैन के सारे नेताओं को ज़रा भी लाज हो, थोड़ी भी गैरत बची हो, रत्ती भर भी इंसानियत बाक़ी हो तो पूरे जिले से सार्वजनिक माफ़ी माँगकर चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। यदि वे अपनी आत्मा में झाँकने की ज़हमत उठा सकें तो पाएंगे कि कलेक्टर शशांक मिश्र उतना मूर्ख और मठ्ठा नहीं था, जितना अपने लालच और राजनीतिक मंसूबों की ख़ातिर सबने मिलकर उसे सिद्ध होने दिया। मौत के सौदागर नेता यदि अपने दिल पर हाथ रखकर ख़ुद से पूछेंगे तो पता चलेगा कि वे ख़ुद कितने नाकारा है जो लगातार 15 साल सत्ता में रहकर उज्जैन में एक ढंग का अस्पताल तक तैयार न करे सकें। जब ठीक समय था तब सब महाकाल की सवारी में मुख्यमंत्री के साथ झांझ बजाते रहे और ज़रा-सी मुसीबत क्या आईं, उज्जैनवासियों के इलाज़ के लिए इंदौर का मुँह ताकने लगे। आरडी गार्डी के बेलगाम और मग़रूर प्रबंधन को नकेल कस जनहित में हाँकने के बजाय हाय-हाय कर अपने निकम्मेपन और बेबसी का ढोल पीटने लगे। 


मत भूलिए, अभी केवल प्रशासनिक सर्जरी हुई है। न मौतों का हिसाब हुआ है, न कॉलेज में काले कारनामों और कोरोना काल में कोताही की क़िताब खोली गई है। जब तक उज्जैन में हुई मौतों के लिए इस कॉलेज के पापी प्रबंधन को सींखचों के पीछे नहीं पहुँचाया जाता, इंसाफ़ अधूरा है। जब तक इस कॉलेज में मनमानी और मगरूरी के बीच मरे लोगों के परिजनों को मुआवजा नहीं मिलता, यह न्याय उतना ही अधूरा है, जितनी इस वक्त अधूरी पड़ी कोरोना के खिलाफ इंसानियत की यह जंग है। 


मेडिकल कॉलेज से इलाज़ के अधिकार छीन लेने और उज्जैन के मरीज़ों को पूरी बेशर्मी के साथ अरविंदो अस्पताल शिफ़्ट करने से नए घरों में फैल सकने वाला सूतक भले रोका जा सकें, जनता के मन में सरकार और अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति अविश्वास का जो सूतक पसरा है, उसे उज्जैन की आने वाली अनेक पीढ़ियों के मन से तब तक नहीं दूर किया जा सकेगा जब तक कि दोषियों की जिम्मेदारी तय कर उन्हें दण्डित नहीं किया जाता।


#vivekchaurasiya  की फेसबुक वॉल से साभार(श्री विवेक चौरसिया देश के जाने-माने पत्रकार एवं चिंतक है)


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