यही है हकीक़त,,,,,,,,,,,,,सबकी नज़रें चिताओं पर हैं। जितनी चिताएँ जलेगी, उतनी चिंताएँ बढ़ेगी। जितना हल्ला मचेगा उतना फण्ड आएगा और जितना ज़्यादा फण्ड आएगा, सबको उतना कमीशन मिलेगा?

मौत के सौदागरों !       ज़रा महाकाल से डरो!


निज़ाम यदि अपने मतलब के लिए अवाम के प्रति फ़र्ज़ और ईमान को ताक पर धर तवायफ़ की तरह तमाशें सजाने पर आमादा हो जाए तब जनतंत्र में कलेक्टर और एसपी जैसे अहम पदों पर बैठे आला अफ़सरों की औकात बदनाम गली के नुक्कड़ पर गजरे बेचने वाले नाचीज़ से ज़्यादा नहीं रह जाती। मज़ाल है कि बाईजी की अदाओं पर ताली बजाकर अपनी मर्दानगी बताने आने वालों की कलाई में मुरझाया हुआ एक फूल तो नज़र आ जाए, तब देखिए बेचारे गजरे वाले पर कैसी गाज़ गिरती है!


कहने की ज़रूरत नहीं कि बात उज्जैन की है जहाँ मग़रूर और केवल सियासी मतलब साधने में मशगूल सूबे की सरकार ने महज़ तीन दिन के भीतर कलेक्टर और एसपी पर कोरोना से कारगर जंग में नाकामी का ठीकरा फोड़ कर दोनों की बलि ले ली है। वह भी तब जब कोरोना से मृत्यु दर के मामले में उज्जैन पहले दिन से देश के सारे महानगरों को पीछे कर डर और फ़िक्र की बदनाम बस्ती बना हुआ है। यानी जब शहर/जिले को जानने-समझने वाले, यहाँ की रग-रग को देख-परखे और आजमाए अधिकारी की सबसे ज़्यादा दरकार हैं तब उन्हें नाकारा साबित कर दरकिनार कर दिया गया है। 


कल्पना की जा सकती है कि जब एक-एक दिन नहीं बल्कि एक-एक घण्टा क़ीमती है और एक-एक मोहल्ला नहीं, एक-एक इंसान की जान दाँव पर लगी है तब अचानक यह मनमाना बदलाव जन-जन के जीवन पर किस कदर भारी पड़ सकता है। प्रशासन और पुलिस के नए मुखिया लाख परम् गुणी हों लेकिन भगवान तो नहीं हैं जो जादू की छड़ी घूमाकर कोरोना को जिले की हद से तत्काल बाहर हकाल आएंगे! वे भी इंसान हैं और यक़ीनन उन्हें भी जिले का ख़ाका, खेल और खामियाँ समझने में थोड़ा वक्त तो लगेगा ही। साफ़ है नए टास्क के टेकओवर के इस छोटे-से किन्तु अत्यंत नाज़ुक दौर का खामियाजा जनता और मैदान-ए-जंग में जूझ रहे जाँबाज़ जवानों और बाक़ी महकमों की टीमों को ही उठाना पड़ेगा।


मगर अफ़सोस कि न तो हमारे स्थानीय नेताओं को इसकी परवाह और फ़िक्र है और न ही प्रदेश सरकार को इसकी अकल और अहसास है। मानो सरकार और सत्ता पक्ष के सारे कर्त्ताधर्ता अपने पाप पर परदा डालने की ज़िद में इतने ज़ुनूनी हो चुके हैं कि बौखलाहट में अपने कपड़े उतारकर पहले ही फेंक चुकने के बाद अफ़सरों को नाकाम बताकर अब अपने नक़ाब भी नोचने पर उतारू हो गए हैं।


जिम्मेदारों! माफ़ कीजिए, आपको मिर्ची तो बहुत लगेगी मगर जनता इतनी मूर्ख नहीं हैं जितनी आपने उसे समझा है। आम लोग गोबर नहीं खाते जो यह न समझ पाए कि प्रशासनिक मोहरों की अदल-बदल के पीछे आपकी नज़र कहाँ है और नीयत क्या है? इसलिए कि यदि दोनों पहले दिन से पाक़-साफ़ होती कमीशन के लालच में आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज जैसे बदइंतज़ामी के मरकज़ को कोरोना सरीखी महामारी के दौर में रेड अस्पताल न बनने दिया होता। यदि आपका ईमान ज़िंदा होता और इंसाफ़ सच्चा होता तो शुरुआती एक महीने में मेडिकल कॉलेज में हुई बेहिसाब मौतों के जिम्मेदार डॉ. वी.के.महाडिक और उसकी चण्डाल चौकड़ी को अब तक बचाया न होता। यदि आपके उसूल दोगले न होते बड़नगर के डॉ. दिलीप गुप्ता पर लापरवाही का इल्ज़ाम लगाकर मुकदमा न ठोंका होता और महाडिक के मुँह में चार करोड़ मासिक की मलाई न धरी होती!


आपका दिल जानता है कि बतौर कलेक्टर शशांक मिश्रा का काम कोरोना की रोकथाम के लिए ज़रूरी मोर्चो की कमान सम्भालना था, मेडिकल कॉलेज में बैठकर मरीज़ों का इलाज करना कतई नहीं था। मगर पूरे महीने भर मोटे माल की आस-प्यास में मेडिकल कॉलेज के कर्णधारों ने पूरी बेशर्मी के साथ अस्पताल से लाशें निकलने दी और आप सब घरों में दुबके मासूमों की मौत का तमाशा देखते रहे। हैरान हूं कि तब आप सभी हज़ार आँखों वाले इंद्रों को न तत्कालीन कलेक्टर में दोष दिखा, न केंद्र और राज्य से मदद का ख्याल आया।  


इतिहास गवाह है कि बीस बरस में उज्जैन के किसी डॉक्टर ने भूलकर भी किसी मरीज़ को आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज में रैफर करने की चूक न की। इसलिए कि जान बचाने वाले जानते हैं कि इस मरघट मेडिकल कॉलेज में भेजा गया मरीज़ जेब कटाकर भी कभी ज़िंदा नहीं लौट सकता। अन्यथा कोरोना के इलाज़ के लिए 500 बिस्तर आरक्षित करने और मोटा सौदा होने के बावज़ूद बड़नगर विधायक मुरली मोरवाल को अपनी जान बचाने के लिए इंदौर नहीं भागना पड़ता। नीलगंगा टीआई यशवंत पाल को भी इसी जगह उपचार दिया जाता, उन्हें अरविंदो ले जाने की नौबत नहीं आती। मगर धर्मेंद्र जोशी से लेकर आपकी ही पार्टी के पार्षद मुज्जफर भाई गुहार लगा-लगाकर मौत के मुँह में समा गए लेकिन आपका सोया हुआ ईमान न जागा, सत्ता के ख़ुमार में सोया ही पड़ा रहा।


अपने स्वार्थ के लिए आपने मिलकर उज्जैन को प्रयोगशाला बना डाला है। कभी माधवनगर तो कभी मेडिकल कॉलेज। कभी पीटीएस में क्वेरेंटाइन की क़वायद तो कभी देवास रोड़ पर जैन उपाश्रय के उपयोग का प्रस्ताव। सांसद की अलग राय तो विधायकों के अलग सुर। कोई मुख्यमंत्री को चिठ्टी लिख रहा है तो कोई केंद्रीय दल से एम्बुलेंस माँग रहा है। कोई कह रहा है 'सब काबू है' तो कोई चीख रहा है, 'हालात बेक़ाबू है!' एक को दान में मिले अनाज की बंदरबांट से फुरसत नहीं है तो दूसरे की नज़र इस पर है कि 'उसके क्षेत्र के मतदाताओं तक भोजन के पैकेट्स पहुँचे या नहीं!' जिसे कसर पड़ी उसकी निगाह में कलेक्टर निकम्मा और जिसकी गाड़ी पुलिस ने रोकी उसकी राय में एसपी चोर!


मजाक ही है कि एक दिन पहले हटाए गए सीएमओ और सीएस के ऑर्डर भोपाल में बैठे अफ़सर अगले दिन स्थगित कर देते हैं और कोई सवाल-जवाब तक नहीं होता। प्रदेश के गृह और स्वास्थ्य मंत्री को शराब की दुकानें खुलवाने की जल्दी है मगर उज्जैन के प्रभारी होते हुए भी इस 'हॉटस्पॉट' में आए दिन बढ़ते मरीज़ों से मचते हड़कम्प को संभालने का समय नहीं मिल रहा। मुख्यमंत्री को मानो राजधानी भोपाल और आर्थिक राजधानी इंदौर से ही सरोकार है। भले उज्जैन का डेथ रेट देश-दुनिया में अव्वल हो मगर सरकार की प्राथमिकता में उज्जैन प्रदेश में तीसरे नम्बर पर ही है। गोया कि वे भी सरकार में सहयोगी अपने साथियों और संगठन पदाधिकारियों से पूछना ही नहीं चाहते कि 500 बिस्तर मेडिकल कॉलेज में और 100 बिस्तर माधवनगर में होने के बावज़ूद इंदौर के अरविंदो और भंडारी अस्पतालों में नए सिरे से 100-100 बिस्तरों की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? क्यों सिंहस्थ में करोड़ों खर्च करके बनाया गया सात मंजिला चरक अस्पताल केवल दिखावे का महल बनकर खड़ा है, महामारी से जंग में किसके इशारे पर निठल्ला पड़ा है?


न भोपाल से उज्जैन का समन्वय है और न ही भोपाल का दिल्ली से। मानो बिल्ली के भाग से कोरोना का छींका फूटा है और डेढ़ साल सत्ता से अलग रहे भाई लोग चिताओं पर रोटियां सेंकने के लिए बिलबिला उठे हैं। न किसी को मोर्चे पर डटे कोरोना योद्धाओं की जान की परवाह है, न ही जंग के लिए ज़रूरी सुरक्षा कवच, दवाइयों आदि की चिंता। सबकी नज़रें चिताओं पर हैं। जितनी चिताएँ जलेगी, उतनी चिंताएँ बढ़ेगी। जितना हल्ला मचेगा उतना फण्ड आएगा और जितना ज़्यादा फण्ड आएगा, सबको उतना कमीशन मिलेगा। जिसे कसर पड़ेगी वो कलेक्टर को रवाना करवाएगा, जिसका काम अटका वह एसपी को निपटवाएगा।


मेहरबानी करके बन्द कीजिए ये प्रशासनिक सर्जरी और प्रशासन, पुलिस और जनता का मनोबल गिराने से बाज़ आइए। सर्ज़री की आवश्यकता सिस्टम से अधिक आपके चरित्र को है। इसलिए कि आईएएस और आईपीएस की ज़्यादा से ज़्यादा कुर्सी बदलेगी, मगर शहर/जिले में आपकी हरक़तों के कारण जिन घरों में सूतक फैल रहा है, उनसे उठती बद्दुआएँ आपका समूल नाश कर देंगी। हम मौत से डरे हुए हैं, मौत के सौदागरों! आप ज़रा महाकाल से डरिए। वो सब देख रहा है!


#vivekchaurasiya की फेस बुक वाल से साभार(श्री विवेक चौरसिया देश के जाने-माने पत्रकार और चिंतक है)


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