भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पुन: स्थापना है, अयोध्या में श्री राम मंदिर का पुनर्निर्माण

 


यह हमारे सनातन धर्म और पुरातन संस्कृति का पुनरंकुरण है


 


आज हमने फिर संकल्प लिया है अपनी संस्कृति और शिक्षा को बचाने का


 


      अयोध्या में श्री राम मंदिर का पुनर्निर्माण कार्य 5 अगस्त से प्रारंभ होने जा रहा है। घटना छोटी सी प्रतीत होती है, एक मंदिर का निर्माण ही तो है, परंतु इसके गहरे अर्थ हैं। राम जन्मभूमि में सदियों पहले ध्वस्त किए गए श्री राम के मंदिर का पुर्ननिर्माण हमारे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पुन: स्थापना का प्रतीक है। यह हमारी सनातन धर्म और सन पुरातन संस्कृति का पुनरंकुरण है। यह हमारे उस संकल्प का प्रतीक है जिसके माध्यम से आज हमने अपनी पुरातन संस्कृति और सनातक शिक्षा को बचाने का बीड़ा उठाया है।


 


      हमारे सनातन धर्म तथा संस्कृति का एक मूल मंत्र रहा है सहिष्णुता, जो कि निश्चित रूप से कायरता नहीं है। हमने दुनिया के हर व्यक्ति को अपना माना है। हम सारी दुनिया को एक कुटुंब मानते हैं। हमारी संस्कृति प्राणीमात्र में ईश्वर के दर्शन करती है, जिसे हम ''राम'' कहते हैं। हमारी इस वैश्विक सोच की वजह से ही हमने समूची मानव जाति को सर्व कल्याण का रास्ता दिखाया है। भारत एक समय था जब विश्व गुरु था। हर क्षेत्र में भारत ने प्रगति के प्रतिमान स्थापित किए। फिर क्या ऐसा क्या हुआ जिसने धीरे-धीरे हमें गुलाम बना दिया? हमारी सोच को संकुचित कर टुकड़ों में बांट दिया? जाति, संप्रदाय, वर्ग, क्षेत्रीयता, ये सब भेद कहां से आए? हममें क्या ऐसी कमी थी जिसके कारण सिरमौर रहा भारत शताब्दियों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा? हमारी कौन सी ऐसी कमी थी जिसके कारण आताताइयों ने हमें दबा दिया हमारी सोच को कुंठित कर दिया और हमें टुकड़ों में बिखेर दिया? आज अयोध्या में श्री राम मंदिर की पुनः स्थापना के समय यह समीचीन होगा कि हम इन बातों पर मंथन करें।


 


      आइए हम ऐतिहासिक दृष्टि से हमारी सभ्यता एवं संस्कृति पर नजर डालते हैं। हमारी संस्कृति का मूल वैदिक सभ्यता में छिपा है। यह समय लगभग 9000 वर्ष ईसा पूर्व का था, जब वैदिक सभ्यता प्रारंभ हुई। इस दौरान मनुष्य का जीवन प्रकृति से पूरी तरह जुड़ा हुआ था वह प्रकृति का एक अभिन्न हिस्सा था। उसकी सारी दिनचर्या प्रकृति पर आधारित थी। वह अपनी शक्ति पृथ्वी, जल, वायु, तेज, आकाश आदि से प्राप्त करता था। उस समय न केवल मानव जाति बल्कि समूची प्रकृति जहां तक कि देवगण से भी हमारे संपर्क थे। मनुष्य का देवताओं के साथ निरंतर संपर्क एवं संवाद था। यह ग्रामीण संस्कृति थी। इस दौरान राजव्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। इस समय राष्ट्र छोटे-छोटे जनपदों में विभक्त था। सारे विश्व में वैदिक संस्कृति के प्रमाण मिले हैं।


 


      इसके बाद हमारे इतिहास में जो सबसे महत्वपूर्ण समय आया वह था भगवान श्रीराम का काल, जिसे त्रेतायुग भी कहा जाता है। इसे लगभग 6000 ईसा पूर्व माना जाता है। भगवान श्री राम के पितामह राजा रघु परम प्रतापी राजा के जिन्होंने पूरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बांधा था। राजा रघु के पश्चात धीरे-धीरे भारत में रक्ष एवं यवन संस्कृति का बोलबाला हो गया था। महाराज दशरथ के आते-आते पूरे देश में रक्ष संस्कृति का प्रसार हो चुका था। लंका में तो रावण का साम्राज्य था ही उसके छत्रप खर दूषण ने दंडकारण्य तक अपनी चौकियां बना ली थीं। वहीं मिथिला से अयोध्या तक राक्षस उत्पात मचाते थे। सभी इनके उत्पाद से परेशान थे। ऐसी स्थिति में भगवान श्री राम ने दुष्टों का संहार किया तथा पूरे भारत को एक सूत्र में बांधा। भगवान श्रीराम ने अयोध्या से अपनी वन की यात्रा प्रारंभ की तथा पूरे भारत को पार करते हुए लंका तक पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मार्ग में विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों को एक किया तथा अधर्मियों को परास्त कर। उन्होंने स्वपच, शबर, खस, जवन, जड़, वानर, कोल, किरात आदि सभी जनजातियों को एक किया तथा राक्षस संस्कृति से लोहा लिया। इन आदिवासियों की मदद से ही उन्होंने रावण जैसे प्रबल राक्षस राज का अंत किया। सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि राम ने रावण का राज भी उसी के भाई विभीषण को वापस कर दिया। उनका उद्देश्य अपने साम्राज्य का विस्तार करना नहीं था, बल्कि वे धर्म की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने दुष्टों का अंत किया तथा सतपुरूषों का उत्थान किया। 


  सबसे पहले भगवान श्रीराम ने विश्वामित्र ऋषि के साथ अयोध्या के निकट स्थित उनके आश्रम से लेकर मिथिला तक के मार्ग में मारीच, सुबाहु, ताड़का आदि के उत्पात से उस क्षेत्र को बचाया। रामकी वन यात्रा पर यदि हम दृष्टि डालें तो पाएंगे कि यह वस्तुतः भारत की एकीकरण की यात्रा थी तथा भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की वह बुनियाद थी, जिस पर आज भी भारत खड़ा हुआ है। हमारे सनातन धर्म एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति की आधारशिला थी। अपनी वनयात्रा में भगवान श्री राम अयोध्या से निकलकर तमसा नदी के तट पर आए तथा नदी पार की। वनवासी निषादराज का साम्राज्य अयोध्या की सीमा से लगा हुआ था। सबसे पहले राम निषाद राज के यहां गए। निषादराज श्री राम के मित्र थे। इसके बाद भगवान श्री राम को निषाद राज श्रृंगवेरपुर ले गए, जहां गंगा किनारे उनकी मल्लाह केवट जनजाति से भेंट हुई। केवट ने भगवान श्री राम को गंगा पार कराई। इसके बाद भगवान श्रीराम प्रयाग गए जहां ऋषि-मुनियों से मिले। श्री राम ने ऋषि मुनियों को राक्षसों के उत्पात से मुक्त्त किया। यहां से श्री राम चित्रकूट पहुंचे। चित्रकूट मध्य प्रदेश के सतना जिले के पास उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित है। यहां उन दिनों बड़ी संख्या में ऋषि एवं मुनि अपने आश्रम बनाकर तप एवं साधना किया करते थे। यहीं भरत जी श्री राम को अयोध्या वापस लेने आए थे। चित्रकूट में ऋषि-मुनियों को अभय प्रदान कर भगवान ने दक्षिण की ओर प्रस्थान किया।


 


दंडकारण्य जो वर्तमान में नासिक के पास का क्षेत्र है उन दिनों घना जंगल था, यहां पर राक्षस संस्कृति ने पूरी तरीके से अपना अधिकार कर लिया था। खर और दूषण ने यहां अपनी चौकियां बना ली थीं। अब भगवान श्रीराम को राक्षसों के मुखिया रावण तक पहुंचना था। उन्होंने एक योजना बनाई। सूर्पनखा की नाक काटकर तथा उसके पश्चात रावण के छत्रप खर एवं दूषण का वध कर भगवान श्रीराम ने सीता हरण की पृष्ठभूमि तैयार की। सीता कोई कमजोर नारी नहीं थीं, वे शष्त्र विद्या में निष्णात थीं, उन्होंने भगवान शिव के धनुष को उठा लिया था, जिसे रावण छू भी नहीं पाया था। रावण में तो सीता को छूने तक की हिम्मत नहीं थी, परंतु वे श्रीराम की अर्धांगिनी थीं अतः धर्म की स्थापना के लिए उन्हें राम का तो हर कदम पर साथ देना ही था। जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से संघर्ष किया और अपने प्राण दे दिए। राम को जटायु की मृत्यु पर अपने पिता की मृत्यु जैसा ही शोक हुआ था। उन्होंने अपने हाथों से जटायु की अंतिम क्रिया की। भगवान श्री राम केवल मनुष्य जाति के प्रतिनिधि नहीं थे, पशु पक्षी पेड़ पौधे प्रकृति सब के प्रतिनिधि थे। यही हमारे सनातन धर्म का मूल मंत्र है, यही हमारी संस्कृति है जो आज भी हमारे अंदर रची बसी है।


 


      गोदावरी नदी पार करके श्री राम तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी के आस पास अनेक स्थानों पर रहने वाली जनजातियों से मिले थे। वहीं वे पंपा नदी के पास शबरी के आश्रम पहुंचे, जो वर्तमान में कर्नाटक में है। शबर जनजाति की शबरी राम की परम भक्त थी। शबर जनजाति की मदद से ही राम का आगे का मार्ग प्रशस्त हुआ। वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे, जहां वानर राज सुग्रीव से उनकी मित्रता हुई। यही वह स्थान था जहां पर उनके परम भक्त श्री हनुमान से उनकी भेंट हुई। भगवान श्री राम ने वानर जनजाति के श्री हनुमान को अपना प्रधान सेनापति बनाकर दुनिया को यह संदेश दिया कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान होता है। सुग्रीव ने चारों दिशाओं में अपने दूत भिजवाए सीता की खोज में। हनुमान जी लंका गए। भगवान श्रीराम ने वानर, कोल, किरात आदि जनजातियों की सेना तैयार की। वस्तुत: ये सब मनुष्य ही थे तथा अपने युद्ध कौशल में जानवरों के पैतरों का इस्तेमाल करते थे।     


 


      श्रीलंका में सीता के होने की पुष्टि होने के पश्चात श्री राम ने वानर एवं ऋक्षों की सेना सहित ऋष्यमूक पर्वत से प्रस्थान किया तथा कोडीकरई में पड़ाव डाला। इसके पश्चात उन्होंने रामेश्वर की ओर कूच किया। रामेश्वरम में भगवान श्रीराम ने भगवान शंकर की प्रतिमा की स्थापना की, जो आज रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है। यह भारत की सांस्कृतिक एकता का ही प्रतीक है कि हम गंगा जी का जल जब तक रामेश्वरम पर न चढ़ा लें तब तक हमारी भारत तीर्थ यात्रा पूरी नहीं होती। यहां से भगवान धनुष्कोटी पहुंचे, जहां उन्होंने रामसेतु का निर्माण किया। यहीं से समुद्र पार कर भगवान श्री राम की सेना लंका पहुंची। श्री राम ने रावण को परास्त कर उसका राज उसके भाई विभीषण को दे दिया। इसके बाद श्री राम अयोध्या लौटे और राम-राज्य की स्थापना की। आज भी राम-राज्य को आदर्श राजव्यवस्था माना जाता है। यह राज व्यवस्था सब प्रकार के भेदों से परे होती है। 


 


 भगवान राम द्वारा स्थापित की गई व्यवस्था लगभग 3000 वर्षों तक चलती रही। इसके बाद पुनः आसुरी शक्तियां सिर उठाने लगीं। यह लगभग 2000 ईसा पूर्व का समय था। समाज में पाखंड बढ़ गया था। सही और गलत की पहचान करना मुश्किल हो रहा था। लोग धर्म की आड़ में अधर्मी हो गए थे। सज्जन पुरुष साहस के स्थान पर कायरता को महत्व देने लगे थे। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण का प्रादुर्भाव हुआ, जिन्होंने भारत में सनातन धर्म की पुनर्स्थापना की। राम-रावण युद्ध की तरह ही श्री कृष्ण ने महाभारत के युद्ध में आसुरी शक्तियों को परास्त कर धर्म की पुन: स्थापना की। 


 


  भगवान श्री कृष्ण के उपरांत फिर लगभग 3000 वर्षों तक भारतीय संस्कृति फलती-फूलती रही है तथा विश्व में भारत सिरमौर रहा। मौर्य वंश में जहां भारत में राजनीतिक एकता आई, वहीं गुप्त वंश में संगीत, कला, साहित्य, युद्ध विद्या, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा शास्त्र भूगोल आदि सभी क्षेत्रों में भारत ने अभूतपूर्व प्रगति की। भारत सारी विश्व की आंखों का तारा था, उसे सोने की चिड़िया कहा जाता था तथा हर व्यक्ति भारत आने के लिए लालायित रहता था। दक्षिण में वाकाटक, पाण्ड्य, चोल, चेर, पल्लव साम्राज्य में भारतीय संस्कृति ने अपनी उन्नति के शिखर को छुआ। सम्राट हर्षवर्धन तक भारतीय कीर्ति पताका सारे विश्व में फहराती रही। परंतु फिर उसके बाद धीरे धीरे भारत अपनी महिमा खोने लगा। और इसका मुख्य कारण था हमारी संस्कृति में एक ऐसे तत्व ने प्रवेश कर लिया था, जिसने हमें कायर बना दिया। और वह था संसार के कष्टों एवं दुखों से भागकर सन्यास ग्रहण कर लेना। इस तत्व ने हमें खोखला कर दिया। सातवीं शताब्दी से ही सिंध पर अरबों के आक्रमण प्रारंभ हो गए थे तथा 11वीं सदी आते-आते विदेशी आक्रांताओं ने भारत में पैर जमाना प्रारंभ कर दिए थे। पहले दिल्ली सल्तनत फिर मुगल साम्राज्य और अंत में अंग्रेजों की गुलामी। इस 1000 साल के इतिहास में भारत आसमान से जमीन पर आ गया। जो भारत कभी सारी दुनिया का सिरमौर था, वह गुलामी की जंजीरों में जकड़ गया। यद्यपि हमारी कुछ बहादुर प्रजातियां राजपूतों, सिक्खों और मराठों ने हमारे धर्म एवं संस्कृति को बचाने की पूरी कोशिश की, परंतु अंग्रेजों ने अपनी कूटनीति से हमें हजारों टुकड़ों में बांट दिया। हम आज चिल्ला चिल्ला के भले ही कहें कि अनेकता में एकता हमारी यह विशेषता, लेकिन यह सच नहीं है। आज भी हमारी राजनीति है वोटनीति और वो है ''डिवाइड एंड रूल'' जो कि अंग्रेजों की देन है।


 


  वर्ष 1947 में भारत स्वतंत्र तो हो गया, परंतु मानसिक गुलामी खत्म नहीं हुई। जिस भोगवादी संस्कृति की नीव अंग्रेज डाल गए, वह अब आजादी के 70 वर्ष बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज वक्त है हमें अपने मूल को खोजने का और यह मूल है श्री राम में। राम एक शब्द नहीं है। राम है भारत की सांस्कृतिक एकता, राष्ट्रीयता, अखंडता, अस्मिता। मुगलों ने जहां हमारी संस्कृति पर प्रहार किया वहीं अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा पर। राम हमारी संस्कृति भी है और शिक्षा भी है। वस्तुत: भगवान श्रीराम ने हमारे सनातन धर्म एवं संस्कृति की स्थापना करने तथा दुष्टों को परास्त कर भारत को एक सूत्र में बांधने के लिए ही वनवास ग्रहण किया था। वैदिक धर्म की पुन: स्थापना एवं भारत को एक करने के लिए ही श्री राम वन गए। भगवान श्री राम ने जो पारिवारिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक मूल्य स्थापित किए वे ही हमारी संस्कृति के मूल मंत्र है।


 


आज भारत श्री राम के आदर्शों पर चलकर ही पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह आकस्मिक नहीं है कि अमेरिका में जहां एक और कोलंबस की प्रतिमा गिराई जा रही है, वहीं न्यूयॉर्क में टाइम स्क्वायर पर भगवान राम के मंदिर निर्माण का जश्न मनाया जा रहा है। आज सारा विश्व सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए के लिए भारत की ओर देख रहा है। 


 


      आज अयोध्या में राम जन्मभूमि में राम मंदिर का निर्माण इस बात का प्रतीक है कि हमने पुनः संकल्प लिया है, अपनी संस्कृति को बचाने का, अपनी शिक्षा को बचाने का, अपने सनातन धर्म को बचाने का, जिसमें न केवल भारत का अपितु समूचे विश्व का कल्याण निहित है। हमारी संस्कृति है सर्वकल्याण की। हम प्रसन्न हों, सारी प्रकृति प्रसन्न हो, सारा विश्व प्रसन्न हो।


 


*डॉ. मोहन गुप्त


पूर्व कुलपति, महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय


* पंकज मित्तल, मुख्यमंत्री के प्रेस अधिकारी


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