देश हित के थे वे अग्रदूत........ "भारत के चंद्रमा "

2020अग्रसेन जयंती ,17 अक्टूबर विशेष 


  जी हां, अग्रदूत थे वे सच्चे अर्थों में ,केवल भारत के नहीं संपूर्ण मानवता के ।अग्रगामी अग्रवालों के ही नहीं ,समूचे भारतीय समाज के अग्रदूत थे वे ।राष्ट्रीय संघर्ष के। देश की अर्थव्यवस्था के आधार कुटीर उद्योगों को नष्ट करने की अंग्रेज़ सरकार की कोशिश ......देश के खेतों और खदानों के कच्चे माल को सस्ते दामों में विदेश भेजना और वहाँ तैयार महंगे माल को भारतीय बाजार में खपाने की नीति अपनाना...... परिणाम कुटीर उद्योगों का विनाश ,फैलती बेरोजगारी, बढ़ती गरीबी। सारी पृष्ठभूमि को समझ उन्होंने 'भारत दुर्दशा 'नाटक लिखा ।देश को जगाने के लिए ।और उसका व्यापक प्रभाव पड़ा-------- 


 


अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी


 पर धन विदेश चली जात,यह अति ख्वारी।


 


     राष्ट्रीय भावना और देश हित के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने के कारण उन्हें अंग्रेजी सरकार का कोप भाजन भी बनना पड़ा ।


 


     अग्रदूत थे वे ----समाज सेवा के ।जब भारतीय स्त्रियों को पढ़ने की कल्पना भी नहीं कर पाते थे ,राजा राममोहन राय और केशव चंद्र सेन को आंदोलन करना पड़ा ।उस वक्त में सन 18 74 में स्त्री शिक्षा के लिए भारतेंदु ने आवाज बुलंद की---- "बाला बोधिनी " नामक पत्रिका प्रकाशित कर ।हजारों की संख्या में गरीब कन्याओं का विवाह करवाया। विधवा जीवन के दुखों के खिलाफ आवाज उठाई। विधवा विवाह की पैरवी की ।विधवाओं के विवाह करवाएं।


  पढ़ाई के महत्व को समझते हुए बड़ी संख्या में स्कूल कॉलेज खोले। दीन दुखियों की सेवा के लिए खुले हाथ से अपना खजाना लुटाया।


 वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए "तदीय "समाज की स्थापना की ।समाज को पीछे धकेलने वाले रीति -रिवाजों और अंध विश्वासों के खिलाफ संघर्ष की मानसिकता तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई


     राष्ट्र सेवा और समाज सेवा के साथ ही वे महान अग्रदूत थे ------हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा के। आधुनिक हिंदी के पितामह माने जाते हैं भारतेन्दु हरिश्चन्द़। आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास का पहला चरण उन्हीं के नाम पर "भारतेंदु युग" कहलाता है। आधुनिक हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करवाने के प्रयासों के आरंभ कर्ता हैं वे। 


 


     अग्रदूत थे वे हिंदी में पहले पहल पत्र- पत्रिकाएं प्रकाशित करवाने के। सन 18 68 में, जब वे केवल 18 वर्ष की उम्र के थे ,कवि वचन सुधा नामक पत्रिका निकाली। जिसमें उस वक्त के बड़े-बड़े विद्वानों, साहित्यकारों की रचनाएं प्रकाशितहोती थी। 


 


  23 साल की उम्र में सन 18 73 में 'हरिश्चंद्र मैगजीन' नामक पत्रिका आरंभ की। साहित्य की अनेक विधाओं का मोटे तौर पर प्रारंभ भारतेंदु युग में हुआ। खड़ी बोली हिंदी में नाटकों की अनवरत व सशक्त परंपरा का सूत्रपात किया।


 


        काशी के प्रतिष्ठित अग्रवाल वैश्य परिवार में जन्मे भारतेंदु का जन्म 9 सितंबर सन 18 50 ईस्वी में हुआ। सन 18 57 की आजादी की पहली लड़ाई यानी प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वक्त भारतेंदु की उम्र 7 वर्ष की थी ।सब कुछ देखना, समझना प्रारंभ हो चुका था ।5 साल की उम्र में ही मां गुजर गई और 10 साल की उम्र में पिता ।स्वतंत्र रूप से देखने -सुनने -समझने की क्षमता भारतेंदु ने खुद विकसित की। बनारस के क्वींस कॉलेज में पढ़ाई की। स्मरण शक्ति व ग्रहण क्षमता उनमें अद्भुत थी। उस वक्त के दिग्गज राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद 'से उन्होंने अंग्रेजी सीखी। स्वाध्याय से बंगला, मराठी ,गुजराती, पंजाबी, उर्दू और संस्कृत भाषा में दक्ष हो गए ।


  अनेक साहित्यिक विधाओं का प्रारंभ भारतेंदु युग से ही हुआ ।भारतेन्दु ने स्वयं खुब लिखा और अन्य को लिखने की प्रेरणा दी ।बाबू बालमुकुंद गुप्त ,प्रताप नारायण मिश्र ,बालकृष्ण भट्ट आदि एक से एक रचनाकार उनकी प्रेरणा से बने ।ये भारतेंदु मंडल के लेखक कहलाते हैं ।अनेक साहित्यिक संस्थाएं भी उन्होने स्थापित की। क्या नहीं किया?अपनीछोटीसीजिंदगीमेउन्होने ने। 


 


   भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में,9सितम्बर सन् 1850को,इतिहास प्रसिद्ध 'जगत सेठ 'के नाम से विख्यात सेठअमीचंद के खानदान में हुआ ।भारतेन्दु उनकी अकूत दौलत के एकमात्र उत्तराधिकारी थे ।भारतेंदु के पूर्वज अंग्रेज भक्त थे और उन्हीं की कृपा से महा- धनवान हुए थे ।परंतु भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस संपत्ति को राष्ट्र के हित के लिए ,राष्ट्र जागरण के लिए ,राष्ट्र सेवा के लिए ,समाज को ऊंचा उठाने के लिए और साहित्य की सेवा के लिए खुले हाथों से लुटाया ।बेहद लोकप्रिय हुए ।सब लोगों ने उनकी राष्ट्र सेवा समाज सेवा और साहित्य सेवा के उपलक्ष में उन्हें भारत के चंद्रमा यानी भारतेंदु की उपाधि से विभूषित किया ।


   व्यक्तित्व के महान सेवा कार्यो की बदौलत कृतज्ञ राष्ट्र जिन उपाधियों से उन्हें नवाजता है ,सम्मानित करता है ,अनेक बार उनके नाम के साथ वे ऐसे जुड़ जाती है मानो उसका अभिन्न हिस्सा हो। ऐसा यदा-कदा ही होता है जैसे महात्मा..... गांधी ,सीमांत गांधी ,शेर ए पंजाब ....लाला लाजपत राय ।'भारतेंदु 'उपाधि थी पर गफलत में प्राय लोग इसे ही नाम समझने लगते हैं ।नाम तो था हरिश्चंद्र ।



  •      भारतेंदु हरिश्चंद्र सचमुच अग्रदूत थे। मात्र 34 साल की अल्पायु में, 6जनवरी सन् 1885को वे नहीं रहे। भारत माता की ,भारत राष्ट्र की ,भारतीय समाज की ,भाषा और साहित्य की सेवा की अलख जगाने वाले ,मशाल जलाने वाले ,परिमाण व गुणवत्ता दोनों में ही ,इतनी -इतनी दिशाओं में इतना कार्य करने वाले ,इतनी इतनी दिशाओं में कार्य करने वाले महान व्यक्तित्व को------- महान पथ प्रदर्शक कहना, अग्रदूत कहना अपने आप में इन शब्दों की सार्थकता ही है।इसलिए सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि ऐसे महान प्रेरणा पुंज की प्रतिमा शहर के सार्वजनिक स्थान पर स्थापित की जाए । नीमच के ख्याति प्राप्त, लब्धप्रतिष्ठ कवि श्री बालकवि बैरागी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रतिमा स्थापित करने का विचार अनेकानेक के सामने व्यक्त किया था और उनकी भावना ठोस आधार पर थी। अतः मानवता के महान अग्रदूत ,सेवा कार्यों के कीर्ति स्तंभ भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रतिमा स्थापना का कार्य केवल अग्रवाल नहीं वरन समस्त समाजों का पुनीत कर्तव्य प्रतीत होता है ।                      ( लेखक .प्रोफेसर एस. एल.गोयल,नीमच)


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