‘जांच’ 12 ग्राहकों के मरने से फलने-फूलने वाले धंधे की!


जिस नशीले पदार्थ को पीने के बाद 14 व 15 ओक्टोबर को 12 फुटपाथी लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, उसके पीछे कौन-कौन जिम्मेदार हैं? इस बात पर सभी लोग जोरदार बहस कर रहे हैं। स्थानीय तौर पर एसपी, कलेक्टर एवं उज्जैन नगर निगम के आयुक्त ने क्रमश: 4 व 2-2 लोगों को दोषी माना है और इनके विरुद्ध निलंबन और बर्खास्तगी जैसी कारवाई भी कर दी है। मगर, नज़रें तो उस रिपोर्ट पर हैं जो SIT मुख्यमंत्री को सौंपेगी! चर्चा है कि मूलत: excise डिपार्टमेंट निशाने पर है पूरे hooch tragedy को लेकर, लेकिन कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि जिले के वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर भी लापरवाही के कारण संभावित एड्मिनिस्ट्रेटिव surgery में प्रभावित हो जाएँ...?      


खुलेआम जहर बेचने का गोरखधंधा है ये!


 जानकारों का स्पष्ट मत है कि ये कच्ची शराब का मामला है, टिंचर या तेजाब पीने का मामला नहीं है क्योंकि उनको पीने से तो जुबान जल जाती है। लोगों को शराब पीना है, तो वो शराब का ही taste लेंगे। कच्ची शराब में अमोनियम नाइट्रेट मिलाई जाती है। इसके high concentration से शराब जहरीली हो जाती है और इसका सेवन करने से लोग मर जाते हैं। लिकर दुकानों पे बिकती है लेकिन कच्ची शराब यानि अवैध शराब को पकड़ने का काम तो एक्साइज़ डिपार्टमेंट का ही होता है। इस विभाग के पास एक्सक्लूसिव एक्साइज़ एक्ट होता है और उसी को अवैध या नकली शराब बनने अथवा बेचने से रोकना चाहिए।


12000 ग्राहक और प्रभावित हुए 12? 


 उधर, स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि परसों आ जाएगी विसरा रिपोर्ट। उनके मुताबिक, जहरीली शराब बेचने का ये धंधा सालों से चल रहा है। जिन्होने इसका सेवन किया था, वो गायब कर दिए गए और मात्र 12 लोगों की डैथ ही रिपोर्ट की गई। उज्जैन मे कम से कम 12000 लोग इस तरह की सस्ती दारू का सेवन करते हैं। क्या 12 ग्राहकों में इतना बड़ा बिज़नस चल सकता है? उज्जैन नगर निगम के भवन मे इस तरह की गतिविधियां चल रहीं थीं, तो संबन्धित अमला भी दोषी ठहराया जाना चाहिए। जब 4 थाना क्षेत्रों से इस तरह के मामले सामने आए हैं तो महज एक थाना क्षेत्र (खाराकुआं) के स्टाफ पर ही कार्रवाई क्यों की गई? शराब महंगी होती है और स्पिरिट सस्ती मिलती है। ethyl alcohol की जगह methyl alcohol बना दिया गया। ये सब poor man आर्मी है।   


बड़ी कार्रवाई की संभावना? 


 जांच समिति के लहजे से लग रहा है कि एक्साइज़ डिपार्टमेंट के कतिपय आला अफसरों पर कारवाई की जाएगी। बड़ी कार्रवाई SIT की रिपोर्ट के बाद ही होगी। अभी जो छिटपुट कार्रवाई हुई है, वो कलेक्टर-एसपी के स्तर की थी। 


धंधा एक नज़र में: 


 कहारवाडी से संचालित मामला। सप्लायर्स ही बाद में agents बन जाते हैं। केमिकल से नशा बनाने का धंधा है ये। भारत भर में यही हो रहा है। denatured स्पिरिट में पानी मिलाकर लोगों को नशा कराया जाता है, जो अपने-आप में सबसे सस्ता होता है। ये बहुत तगड़ा नशा होता है, देशी शराब के एक पौए से पाँच गुना ज्यादा। मरे 12 लोग हैं, लेकिन consumption तो बड़ी मात्रा में होता ही है। दो दिन में कुछ लोगों को high concentration का नशा सप्लाइ कर दिया गया, सो वे मर गए। कोई धंधेबाज रोज इसी तरह का नशा उपलब्ध कराएगा तो उसकी चपेट में ज्यादा लोग आएंगे ही। ये तो लगातार चल ही रहा था और ऐसा नहीं था कि सिर्फ दो ही दिनों में high concentration का नशा बनाया गया हो!


 


कितने मरे? 


 मृतकों में अधिकांश भिखारी टाइप लोग हैं, जिनके लिए कोई रोने वाला नहीं, इसलिए उनकी संख्या के बारे में पता ही नहीं चला। जो क्लास प्रभावित हुई है उसमें कोई भी आदमी प्राइवेट अस्पताल में नहीं जा सकता था! 20-30 रुपए की शराब पीने वाला व्यक्ति क्या और कैसे अपना इलाज कराएगा? 4 लोगों की शॉर्ट पीएम रिपोर्ट 14 ओक्टोबर को दे दी थी, शेष 8 की दी जानी है। विसरा ग्वालियर भेजा गया है। 12 के अलावा कोई पीएम डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में नहीं हुआ है। Bodies 2 दिन मे पहुंची थीं, पहले दिन 4 और दूसरे दिने 8। लेकिन क्या उन दो दिनों यानि ओक्टोबर 14 व 15 को सिर्फ 12 लोगो ने ही जहरीली शराब का सेवन किया था। क्या इस गोरखधंधे में लिप्त लोग 12 ग्राहकों के भरोसे ही अपना धंधा चला रहे थे? क्या बाकी लोगों ने उन दिनों उपवास रख लिया था? 


 


#निरुक्तभार्गव #पत्रकार #उज्जैन की फेसबुक वॉल से साभार


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