डॉ.पुरू दाधीच:पूरे विश्व में शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में गौरवान्वित किया है


80 वर्ष की उम्र में भी कथक के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं उज्जैन के डॉ.पुरू दाधीच, महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित विश्व के इकलौते नर्तक शीघ्र ही नवाज़े जायेंगे पद्मश्री से
 
उज्जैन। उज्जैन में 17 जुलाई 1939 को जन्मे डॉ.पुरू दाधीच आज भी कथक नृत्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं। इन्होंने उज्जैन और मध्यभारत को पूरे देश ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में गौरवान्वित किया है। यह हम सबके लिये बड़े गर्व का क्षण होगा, जब आने वाले समय में डॉ.दाधीच पद्मश्री से नवाज़े जायेंगे।
 उल्लेखनीय है कि डॉ.दाधीच विश्व के इकलौते नर्तक हैं, जिन्हें अखिल भारतीय गंधर्व महाविद्यालय मण्डल द्वारा महामहोपाध्याय की उपाधि से विभूषित किया गया है। इसके अलावा इन्होंने विश्व में सबसे पहले कथक नृत्य में संगीताचार्य (डॉक्टरेट ऑफ म्युजिक) और संस्कृत नाट्य में पीएचडी की है।
 डॉ.दाधीच को नृत्य और संगीत के क्षेत्र में अभूतपूर्व और अतुलनीय योगदान के लिये संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार-2019 से सम्मानित किया गया है। डॉ.दाधीच न केवल एक कुशल कथक नर्तक और कोरियोग्राफर हैं बल्कि नाट्य और नृत्यशास्त्र के विद्वान भी हैं। इन्होंने ही मध्यभारत में नृत्य की सर्वप्रथम कक्षा उज्जैन के शासकीय माधव संगीत महाविद्यालय में सन 1961 में प्रारम्भ की थी। उज्जैन डॉ.दाधीच की जन्म और कर्मभूमि दोनों रही है। पूरे मध्य प्रदेश में कथक नृत्य को विश्वविद्यालयीन स्तर पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय इन्हें ही जाता है।
 विक्रम विश्वविद्यालय और इन्दौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में नृत्य संकाय इनके द्वारा ही स्थापित किये गये हैं तथा कई अन्य विश्वविद्यालयों में संगीत के कोर्स और सिलेबस बनाये गये हैं।
 कथक नृत्य में मध्य प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के लिये डॉ.दाधीच द्वारा सर्वप्रथम पाठ्यक्रम का निर्माण किया गया। इन्होंने साथ ही भरतनाट्यम के लिये पहली हिन्दी पाठ्यक्रम पुस्तक भी लिखी। इसी वजह से हिन्दीभाषी राज्यों के छात्रों को भरतनाट्यम नृत्य को बेहतर ढंग से समझने की प्रेरणा और अवसर दोनों मिले। डॉ.दाधीच द्वारा लिखी गई नृत्य पर आधारित पाठ्यपुस्तकों को आज भी देश-विदेश के विश्वविद्यालयों और संगीत संस्थानों में पठन-पाठन के लिये प्रयोग किया जा रहा है। इनके द्वारा अब तक नृत्य पर 14 किताबें लिखी जा चुकी हैं और अनगिनत शोध प्रबंध भी प्रकाशित हुए हैं।
 डॉ.दाधीच ने कथक नृत्य की अनेक विलुप्त होती परम्पराओं जैसे ध्रुपद नर्तन, कथाकथन और संगीत नृत्य परम्पराओं को पुनर्जीवित करने का सार्थक प्रयास किया है। इन्होंने एक तरफ अर्द्धनारीश्वर, नायक-नायिका भेद, देवी-देवताओं की स्तुति आदि की कई सरस रचनाएं की हैं। साथ ही दूसरी तरफ अनेकों तालपक्ष की सुन्दर और आसानी से समझ आने वाली रचनाएं जैसे लक्ष्मणगीत, जातिमान, यतिमाला, तालमाला आदि भी की है। इनमें ताल विभाजन अपने आप प्रकट हो जाता है।
 डॉ.दाधीच के मार्गदर्शन में 10 विद्यार्थियों को पीएचडी की उपाधि मिल चुकी है और कई शोध अभी भी कार्यरत हैं। इन्होंने विश्व में प्रथम डिप्लोमा इन नाट्यशास्त्र कथक के सन्दर्भ में भरत कॉलेज मुम्बई में प्रारम्भ किया है। साथ ही मुम्बई के कथक दर्पण फाण्डेशन में विश्व का सर्वप्रथम डिप्लोमा इन कथकशास्त्र नामक कोर्स प्रारम्भ किया है। इन्होंने कथक नृत्य पर कई अविस्मरणीय लेख भी लिखे हैं।
 डॉ.दाधीच द्वारा विगत 50 वर्षों से देश के लगभग सभी प्रमुख नगरों और प्रतिष्ठित मंचों पर कथक नृत्य के एकल और युगल प्रदर्शन किये गये हैं। इनमें हरिदास संगीत सम्मेलन मुम्बई, भास्करराव संगीत सम्मेलन चंडीगढ़, जयदेव संगीत सम्मेलन सिलचर, कथक प्रसंग भोपाल, रामायण मेला चित्रकूट, अयोध्या, प्रयाग, चन्दन चौबे शताब्दी समारोह मथुरा और भातखंडे संगीत समारोह लखनऊ शामिल है।
 डॉ.दाधीच के शास्त्रीय नृत्य और संगीत के क्षेत्र में योगदान का जितना वर्णन किया जाये, उतना कम है। निश्चित रूप से डॉ.दाधीच सभी शास्त्रीय कलाप्रेमियों के प्रेरणास्त्रोत हैं।


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