एक्सक्लूसिव इंटरव्यू,,,,,,,,,,,,लॉक डाउन में क्या आप बाहर जाना चाहते हैं,,,,,,,,,,,,,,

  • किसी ने लाश का फोटो भेजा तो किसी ने राजनैतिक दबाव का उपयोग किया लेकिन रात 3 बजे तक भी काम किया और कर्तव्यनष्ठा के आगे झुके नहीं अधिकारी 
    उज्जैन।अचानक लॉक डाउन होने से मध्यप्रदेश में हजारों लोग फंस गए । जो प्रदेश में ही या प्रदेश से बाहर जाना चाहते हैं। कोई पिता के अंतिम संस्कार के लिए तो कोई बेटे से मिलने या फिर कोई बीमार मां को देखने आया था । कुछ ऐसे भी हैं जिनका इलाज प्रदेश के बाहर देश के जाने माने चिकित्सकों से चल रहा है जिनमें कैंसर, हार्ट  के ज्यादा मरीज हैं ।ऐसे लगभग95000 लोग हैं जो मध्य प्रदेश से बाहर जाना चाहते हैं ।क्या इन्हें आसानी से अनुमति मिल रही है? क्या संवेदनशील और अति संवेदनशील मामलों में इजाजत दी जा रही है ?क्या फंसे हुए लोग सरकार की कार्यप्रणाली से खुश हैं? ऐसे अनगिनत सवालों के जवाब के लिए दैनिक मालव क्रांति ने उज्जैन के नोडल अधिकारी सुजानसिंह रावत से चर्चा की ।चर्चा में जो सामने आया वह बेहद चौंकाने वाला था। अनुभव की बात करें तो वे भी बेहद डरावने थे। हमारे सवाल और उनके जवाब 
    सवाल -  मध्य प्रदेश में कितने लोगों ने अनुमति मांगी ?
    जवाब -  प्रदेश में लगभग 95000 आवेदन पोर्टल के माध्यम से प्राप्त हुए ।जो अलग-अलग कैटेगरी के थे ।
    सवाल  - आवेदन प्राप्त होने के बाद अनुमति की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है?
    जवाब -  आवेदन सीधा भोपाल मुख्यालय पहुंचता है वहां हाउसिंग बोर्ड के कमिश्नर आेर संजय दुबे (दोनों वरिष्ठ अधिकारी) आवेदन का परीक्षण करते हैं ।जिस जिले का  आवेदन होता है उस जिले के नोडल अधिकारी से अभिमत मांगा जाता है और उसी आधार पर अनुमति मिलती या रिजेक्ट होती है।
    सवाल  - आवेदन में अनुमति मांगने का आधार क्या रहता है?
    जवाब-  अधिकांश आवेदन में मां वहां अकेली है, पिताजी को डॉक्टर को बताना है, पत्नी और बच्चे परेशान हो रहे हैं ,इस तरह की परेशानियां बताई जाती है ।जबकि कुछ आवेदन सस्पेक्टेड भी होते थे जो अनुमति मिलने पर न्यूसेंस  पैदाकर सकते हैं ।कुछ में अंतिम संस्कार तो कुछ नौकरी पर जाने और कुछ इलाज के लिए एक्सपर्ट को दिखाने के आए।
    सवाल - तो फिर अनुमति किसे देते थे?
    जवाब- मेरे साथ 9 अधिकारियों कर्मचारियों की टीम थी। जो आवेदन का गहन परीक्षण करने के बाद,   तय गाइडलाइन के आधार पर ,अनुमति देती या रिजेक्ट करती ।इसके लिए आवेदन का प्रिंट आउट निकाल कर हस्ताक्षरित पत्र जारी कर साइट पर अपलोड करना होता है ।अनुमति आवश्यक सेवा के लिए जाने हेतु या फिर परिवार में अचानक मौत होने पर अंतिम संस्कार करने जैसे मामलों में दी गई । 11वां 12 वां  13वां या पगड़ी रस्म करने या फिर पत्नी अकेली है उसके पास जाना है ऐसे कारणों वाले आवेदन भी निरस्त हुए हैं।
    सवाल  -सभी को अनुमति दे देते तो क्या होता?
    जवाब- कोरोना का विस्फोट हो जाता। क्योंकि सबको अनुमति देने का अर्थ था लगभग 200000 लोगों का वाहन सहित सड़कों  पर आ जाना जो बेहद खतरनाक था । वैसे भी उज्जैन ,इंदौर ,भोपाल से मूवमेंट की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि यह रेड जोन में है।
    सवाल-  कैसा रहा अनुभव?
    जवाब - बेहद डरावना और खौफनाक ,,,,,,,,क्योंकि अनुमति के लिए हर तरह के दबाव आए। कुछ लोगों ने अपने मां बाप व रिश्तेदारों की लाश के फोटो तक भेजे, जो हृदय विदारक होते थे ।रात में 3:00 बजे भी फोन लगाकर पूछते थे कि हमारे आवेदन को रिजेक्ट क्यों कर दिया गया? फोन पर समस्या बताकर अनुमति चाहते और अनुमति न मिलने पर नाराजगी जाहिर करने वालों को संतुष्ट करना बड़ा टास्क था। कुछ लोगों ने शहर में घूमने के लिए अनुमति मांगी।



  • बातचीत के आधार पर सुजान सिंह रावत ने बताया कि या तो परिवार में एक या दो दिन पहले किसी की मृत्यु हो गई हो या फिर मेडिकल इमरजेंसी पर  (जिसका इलाज स्वयं के शहर या मध्य प्रदेश में संभावना न होने पर) यह अनुमति दी गई। उज्जैन से लगभग 2100 लोगों ने आवेदन किए थे 105 के आसपास अनुमतियां जारी की गई। उन्होंने यह भी बताया कि अनुमति का काम अब डाबर साहब देख रहे हैं।


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