आज सहस्त्रार दिवस की स्वर्ण जयंती मना रहे विश्व के लाखों सहजयोगी


50 वर्ष पहले 5 मई 1970 को श्रीमाताजी निर्मला देवी ने की थी सहजयोग की शुरुआत-130 से अधिक देशों में सिर के ऊपर तालु पर तथा हाथों पर ठंडी हवा तथा चैतन्य का अनुभव कर रहे हैं साधक
हर युग में अवतरण होते रहे हैं और धर्म की रक्षा के लिए आसुरी शक्तियों का नाश किया गया बल्कि अलग-अलग तरीके से मोक्ष प्रदान किए गए..कलियुग में परमात्मा नये रूप में कार्य कर रहा है तथा सिर के ऊपर जो तालूँ है उसे संस्कृत सहस्त्रार कहते हैं वह आदि शक्ति के अवतरण ने खोल दिया है तथा इस वैश्विक आध्यात्मिक घटना को आज 5 मई को 50 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। पूरे विश्व में सहजयोगी सहस्त्रार दिवस मना रहे हैं। 
कलियुग के इस युग में जहाँ व्यक्ति तेजी से आगे बढऩा चाहता है और पूरी ताकत लगाकर अपने लक्ष्य को पाना चाहता है लेकिन इसी दौड़ में वो कब संतुलन खो देता है और स्वयं को परमात्मा की शक्तियों से दूर कर लेता है, उसे पता ही नहीं चलता..इतना ही नहीं कई बीमारियों से भी उम्र से पहले घिर जाता है..आज की पीढ़ी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों और धर्म स्थानों पर तो जा रही है लेकिन उसे ईश्वर की शक्तियों पर विश्वास नहीं क्योंकि उसने आज तक उन्हें जाना ही नहीं..धर्मस्थानों पर दर्शनार्थी प्रार्थना कर रहे हैं, मन्नतें मांग रहे हैं लेकिन वे कितनी पूरी होंगी इसका उन्हें पता नहीं और यही कारण है कि अविश्वास के चलते व्यक्ति चिंता में डूब गया है और चारों तरफ डिप्रेशन, भय,, असंतोष, क्रोध का साम्राज्य स्थापित हो गया है, ऐसे में श्रीमाताजी निर्मला देवी द्वारा आदि शक्ति के रूप में जन्म लिया गया और 5 मई 1970 को गुजरात में नारगोल स्थित समुद्र के किनारे ध्यान धारणा कर समूचे ब्रह्मांड का उन्होंने सहस्त्रार खोला और इससे कलियुग में नया जन्म पाने की तथा आत्मसाक्षात्कार देने की शुरुआत मानव जाति के लिए हुई। 1970 के बाद श्रीमाताजी द्वारा धीरे-धीरे नये साधकों को जोड़ा गया, उनकी कुंडलिनी शक्ति जागृत की गई तथा उन्हें शीतल चैतन्य लहरियों का अनुभव कराया गया। श्रीमाताजी ने बताया कि जन्म से ही व्यक्ति के अंदर कुंडलिनी शक्ति रहती है जो कि मनुष्य की पवित्र शक्ति है और इसके जागरण के बाद ही परमात्मा की शक्तियों का अनुभव किया जा सकता है। सहज योग में आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के बाद नये साधकों को न केवल चैतन्य लहरियों का अनुभव हुआ बल्कि शरीर में स्थित चक्र नाड़ियों पर उन्होंने शक्ति महसूस की और तनाव से परे एक आत्म सुख तथा प्रसन्नता का भी अनुभव किया। इसके बाद श्रीमाताजी द्वारा भारत के कई शहरों तथा विश्व के कई देशों में सहजयोग के कार्यक्रम आयोजित किए। इसके उपरांत आज विश्व के 130 से अधिक देशों में सहज योगी आनंद के साथ ध्यान धारणा कर परमेश्वरी आनंद को उठा रहे हैं..और इतना ही नहीं इस आनंद को दूसरों को भी बाँट रहे हैं और नये लोगों को भी श्रीमाताजी के फोटो के समक्ष हाथ फैलाकर उन्हें नाडिय़ों का संतुलन दिलाया जा रहा है तथा चक्रों की शुद्धि के लिए प्रार्थना कराकर कुंडलिनी शक्ति का जागरण कराया जा रहा है। सहज योग में आज सभी देशों के प्रतिष्ठित लोग, आम व्यक्ति, ग्रामीण, छात्र और अन्य विधा के मनुष्य शामिल हैं तथा प्रतिदिन ध्यान धारणा कर वे तनाव रहित संतुलित जीवन जी रहे हैं। सहजयोग पूरी तरह नि:शुल्क है और फेसबुक, यू ट्यूब तथा सोशल मीडिया पर भी काफी नये साधक जुड़ रहे हैं। कोरोना बीमारी के चलते जो वैश्विक लॉकडाऊन हुआ है उसमें ऑनलाईन मेडिटेशन के द्वारा एवं ध्यान विधि के द्वारा घर बैठे ही नये लोगों ने आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त किया एवं हाथ की हथेलियों पर, उंगलियों पर तथा सिर के ऊपर तालू पर दैवीय चैतन्य लहरियों को महसूस किया। सहजयोग ध्यान के द्वारा व्यक्ति अपनी दबी शक्तियों को प्राप्त कर लेता है और गृहस्थ जीवन के साथ श्रेष्ठ मनुष्य का जीवन व्यतीत करता है। आज 5 मई को सहजयोग की स्वर्ण जयंती है तथा 50 वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, इस विशेष दिन को सभी देशों में लाखों सहजयोगी उल्लास के साथ मना रहे हैं। सहज योग में श्रीमाताजी द्वारा बताई विधि से व्यक्ति के अंदर स्थित पाँच चक्र और उनकी नाडिय़ों की शुद्धि कराई जाती है, जब अंदर ही कोई विकार नहीं रहता तो बाहर भी ऐसा व्यक्ति सुखी, स्वस्थ जीवन व्यतीत करता है। सहजयोग की शुरुआत इस पूरे कलियुग को परमात्मा की सबसे अनमोल देन है। इसका लाभ हर व्यक्ति ले सकता है। सहज योग सीखने के लिए टोल फ्री नंबर 180030700800 है ।सहज योग नेशनल ट्रस्ट के वाइस चेयरमेन श्री दिनेश रय, नेशनल टेस्टी श्री अनिल जोशी एवं मध्य प्रदेश कोआर्डिनेटर श्री महेन्द्र व्यास ने बताया कि स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर नारगोल गुजरात से पिछले वर्ष 5 मई को चेतन्य रथ यात्रा प्रारंभ हुई थी जो एक वर्ष तक पूरे देश में घूमी और इस दौरान लाखों नए साधकों को सहज योग के माध्यम से ध्यान की विधि बतायी गई ।


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