कोविड़ -19 से CHL में मरने वालों में से कुछ मौतें हेल्थ बुलेटिन में शामिल क्यों नहीं?, अनाधिकृत तौर पर कोविड-19 का इलाज करने वाले अस्पतालों को अभयदान क्यों ?

उज्जैन ।शहर में कोरोना पोजीटिव मरीजों का उपचार करने के लिए दो अस्पतालों को बकायदा ‘रेड हॉस्पिटल’ घोषित किया गया था। इनमें से एक ‘निजी’ यानी आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज तो दूसरा ‘सरकारी’ यानी माधव नगर हॉस्पिटल था। इन में सभी प्रकार के टेस्ट्स, दवाइयाँ, बेड खर्च, डॉक्टर और स्टाफ की फीस और चाय, नाश्ता, भोजन इत्यादि सुविधाएं निशुल्क उपलब्ध कराए जाने के निर्देश थे। मरीजों को रिफ़र किए जाते समय और उनकी मृत्यु हो जाने पर अंतिम संस्कार के लिए लगने वाले शव-वाहन और शव को प्रोटोकाल के तहत परिवहित करने में लगने वाले खर्च को भी शासन ने ही व्यय किया।


 इस व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए शहर के कतिपय निजी अस्पतालों ने कोरोना रोगियों का न केवल अवैधानिक रूप से उपचार किया, बल्कि मोटी रकम हथियाते हुए अनेकों मरीजों को यमराज के पास भेज दिया। इंदौर स्थित एक समूह द्वारा शहर के हरिफाटक रोड पर संचालित आधुनिक तकनीक से सुसज्जित बहु-मंज़िला सीएचएल मेडीकल सेंटर में इस तरह की कई अनियमितताएँ उजागर हुईं हैं। तेजनकर अस्पताल में जब वेद नगर निवासी एक बुजुर्ग व्यक्ति की कोरोना संक्रमण के चलते मौत हो गई और उनके युवा पुत्र भी कोरोना संक्रमित हो गए तो जिला प्रशासन ने उक्त अस्पताल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। इस तरह की कार्रवाई की जनता के बीच बहुत चर्चा रही की महज एक अस्पताल को ही क्यों सूचना-पत्र जारी किया गया। अन्य अस्पतालों की धांधलियों को किन कारणों के चलते छोड़ दिया गया?    


फ्रीगंज की पुरानी सब्जी मंडी मे 61 साल के व्यक्ति की जिन परिस्थितियों में 26 मई को मौत हुई थी, उसका मामला आज भी संदर्भ में आता है। दोनों कोविड अस्पतालों का चक्कर लगाने के बावजूद जब उन्हें किसी भी निजी अस्पताल ने भर्ती नहीं किया, तो उनके परिजन सीएचएल मेडीकल सेंटर की शरण में पहुँच गए। अस्पताल प्रबंधन ने इलाज के नाम पर 31 हजार रुपए ले लिए, मगर स्पष्ट किया कि उक्त मौत कोरोना के कारण नहीं हुई। परिजन पार्थिव शरीर को चक्रतीर्थ स्थित शमशान में ले गए, जहां उनका लकड़ी-कंडे से अंतिम संस्कार हुआ। उनका अंतिम संस्कार कोरोना प्रोटोकॉल के तहत विद्युत शवदाह-गृह में नहीं किया गया। दो दिन बाद प्रशासन ने उक्त व्यक्ति की मौत को कोरोना मृत्यु में दर्ज कर लिया और उक्त बहुमंजिला इमारत में रहने वाले उक्त व्यक्ति के घर और इमारत और और आस-पास के हिस्से को छावनी में बदल दिया। उसी दौरान उक्त इमारत में रहने वाले मृतक के बेटे सहित एक अभिभाषक भी कोरोना की चपेट में आ गए। एक युवा व्यवसायी भी कोरोना संक्रामण का शिकार बने औरबिंदो, इंदौर में जीवन का संघर्ष हार गए। उनकी पत्नी और बेटा भी कोरोना संक्रमित हो गया,जिनका लंबी अवधि तक इंदौर के अरबिंदो में इलाज़ चला। आटा-चक्की की दुकान के पीछे स्थित एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान के मालिक और उनके कुछ परिजन भी कोरोना संक्रमण का शिकार बने।    


 उज्जैन नगर निगम के जन्म-मृत्यु पंजीयन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार 27 मार्च को नागदा निवासी एक 85 साल की महिला सबसे पहले उक्त हॉस्पिटल में कोरोना की ग्रास बनी। 13 मई को कार्तिक चौक, उज्जैन के 55 साल के पुरुष भी उपचार के दौरान कोरोना जंग हार गए और उनकी मौत हो गई। मुद्दे की बात ये है कि उक्त हॉस्पिटल CHL द्वारा जारी किए गए फॉर्म नंबर-14 (A) में उल्लेखित उक्त मौतों के कारण के चिकित्सकीय प्रमाण-पत्रों में उक्त मरीजों की मृत्यु का कारण साफ तौर पर ‘कोरोना डैथ’ बताया गया। इसी आधार पर नगर निगम द्वारा मृत्यु प्रमाण-पत्र भी जारी किए गए। यही नहीं, नगर निगम की दमकल इकाई ने भी पुष्टि की कि उक्त शवों को उक्त अस्पताल से कोरोना प्रोटोकाल के तहत परिवाहित कर उनका अंतिम संस्कार किया गया। आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि गैर-कोविड़ अस्पताल में हुई उक्त मौतों को मेडीकल बुलेटिन में ‘कोरोना डैथ’ नहीं माना गया। उधर, प्रशासन ने अपने ही मेडीकल बुलेटिन में स्वीकार किया है कि उक्त गैर-कोविड़ अस्पताल में में तालाबंदी के दौरान 6 व्यक्ति कोरोना संक्रमण के चलते दिवंगत हुए,लेकिन इन दो मौतों को कोविड 19 डेथ नहीं माना?                                              इस संबंध में दैनिक मालव क्रांति ने Chl के वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर दीपेश शर्मा से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि नागदा की महिला रूटीन आईसीयू में भर्ती थी और उसकी मौत कोविड-19 से नहीं हुई, सिंहपुरी निवासी पेशेंट को लेकर उनका कहना है कि उक्त व्यक्ति ओपीडी से आया होगा इसका आईपीडी में कोई रिकॉर्ड नहीं है ,हो सकता है कि ब्रॉड डेड भी आया हो, क्योंकि उस वक्त इस तरह के केस बहुत आ रहे थे


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