साहसी, दृढ़निश्चयी और आत्म‍ विश्वास की धनी,,, डीएसपी श्रीमती सोनू परमार बनी महिला सशक्तिकरण की मिसाल

 *"सम्मान अभियान पर विशेष, सफलता की कहानी" 

मिलिये शहर की डीएसपी महिला अपराध शाखा की श्रीमती परमार से पहले पीएससी के द्वारा वन विभाग में चयनित हुई थी लेकिन जनता की सुरक्षा के जज़्बे के कारण दोबारा परीक्षा देकर बनी डीएसपी*


उज्जैन । मध्य प्रदेश सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा तथा सशक्तिकरण के लिये प्रदेश के सभी जिलों में विगत 11 जनवरी से सम्मान अभियान प्रारम्भ किया गया है। इस अभियान के अन्तर्गत शहर के विभिन्न क्षेत्रों में काफी समय से सक्रिय कुछ महिलाओं से रूबरू होने का मौका मिला, जिन्होंने लगातार जनसेवा करते हुए समाज में चहुंओर अपनी सफलता का परचम लहराया है। ये महिलाएं न केवल महिला सशक्तिकरण की मिसाल हैं, बल्कि नई पीढ़ी के लिये प्रेरणास्त्रोत भी है।

इसी कड़ी में आपकी मुलाकात करवाते हैं उज्जैन जिले की महिला अपराध शाखा की डीएसपी श्रीमती सोनू परमार से। विनम्र और सहयोगी स्वभाव की होने के साथ-साथ श्रीमती परमार उतनी ही साहसी, दृढ़निश्चयी और आत्म‍ विश्वास की धनी


हैं। श्रीमती परमार मूल रूप से शुजालपुर की रहने वाली हैं। शुजालपुर के पास उनका पैतृक गांव है। उनके परिवार में पति, एक पांच साल का बेटा और सास-ससुर हैं। मुख्य रूप से विवाह के पहले भी श्रीमती परमार का नाता एक कृषक परिवार से था और विवाह के पश्चात भी यह नाता जुड़ा रहा। श्रीमती परमार के ससुर भी एक कृषक हैं। उन्होंने बताया कि उनका विवाह मात्र 20 वर्ष की उम्र में हो गया था। उस समय वे पढ़ाई कर रही थी।

श्रीमती परमार की इच्छा थी कि वे प्रशासन से जुड़कर आमजन की सेवा करें। इसके लिये उनके पिता से उन्हें प्रेरणा मिली थी। उनकी इच्छा को पूरा करने में उनके पति और ससुरालवालों ने पूरा-पूरा सहयोग किया। शादी के बाद उन्होंने न सिर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी प्रारम्भ की। महाविद्यालय तक की पढ़ाई उन्होंने शुजालपुर में की तथा उसके पश्चात इन्दौर में रहकर लोकसेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी की। सन 2016 में लोकसेवा आयोग की परीक्षा में सफल होने के पश्चात श्रीमती परमार का चयन वन विभाग में हो गया था, लेकिन उनकी हमेशा से यही इच्छा थी कि वे सीधे तौर पर जनता की सेवा करें।

इसी तीव्र इच्छा और जनता की सुरक्षा के जज़्बे की वजह से श्रीमती परमार ने दोबारा लोकसेवा आयोग की परीक्षा दी और कठोर परिश्रम की बदौलत उनका 2018 में चयन डीएसपी के पद पर हो गया। श्रीमती परमार ने बताया कि उनकी पहली पोस्टिंग सीहोर जिले में हुई थी, जहां दो वर्ष का समय परिवीक्षा अवधि का था। उस समय वे थाना इंचार्ज थी। उस समय के एक महिला अपराध प्रकरण के बारे में उन्होंने बताया कि वहां एक 10 वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया था। बच्ची के परिवारवाले बेहद गरीब थे। उस समय यह उनका पहला प्रकरण था। श्रीमती परमार ने प्रकरण में जांच पड़ताल प्रारम्भ की और दोषियों को काफी कम समय में गिरफ्तार किया था।


श्रीमती परमार ने बताया कि लोगों की सेवा करने के लिये सिविल सर्विसेस आपको एक बहुत बड़ा मंच प्रदान करती है। उस समय की एक अन्य घटना के बारे में बताते हुए श्रीमती परमार ने कहा कि बारिश के मौसम में एक बार रात में उन्हें सूचना प्राप्त हुई कि उनके थाना क्षेत्र में स्थित एक गांव में कुछ लोग बाढ़ में फंसे हुए हैं। वे एक ही परिवार के थे तथा उनकी कार पानी के तेज बहाव के कारण बह गई थी तथा वे अपनी जान बचाने के लिये एक पेड़ पर चढ़ गये थे। श्रीमती परमार ने तत्काल एक्शन लेते हुए एसडीआरएफ की टीम से सम्पर्क किया तथा स्वयं भी अपनी पूरी टीम के साथ मौके पर पहुंची और टीमवर्क के द्वारा चार लोगों की जान बचाई। उन्होंने कहा कि हमें ट्रेनिंग के दौरान यही सिखाया जाता है कि मानव जीवन की रक्षा ही सर्वोपरि है। इसी के लिये हमें निरन्तर प्रयास करते रहना है। यही चीज सबसे अधिक मायने रखती है।

एक कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारी होने के साथ-साथ श्रीमती परमार उतनी ही अच्छी गृहिणी और मां भी हैं। खाली समय में उन्हें तरह-तरह का खाना बनाना और मेडिटेशन करना पसन्द है। अपने कर्त्तव्य और परिवार के बीच उन्होंने एक बेहतरीन तालमेल कायम किया है। उज्जैन में बतौर डीएसपी उनकी नियुक्ति अक्टूबर-2020 में हुई है। उन्होंने बताया कि उनका पांच साल का छोटा-सा बेटा उन्हें वर्दी में देखकर खुश होता है। कई बार ड्यूटी के दौरान उन्हें परिवार से दूर रहना पड़ता है, तब बेटे की याद भी आती है, लेकिन साथ ही वह शपथ भी याद आती है, जो उन्होंने पुलिस सेवा के समय ली थी।


श्रीमती परमार का मानना है कि कुदरत ने महिलाओं को असीमित सहनशक्ति और ताकत दी है, इसलिये महिलाएं कभी भी अपने आपको कमजोर न समझें और जीवन में होने वाले छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव से घबराये नहीं, बल्कि उनका डटकर मुकाबला करें। समाज के ऐसे लोग जो संकीर्ण विचारधारा, मानसिकता तथा अपराधी प्रवृत्ति के हैं, उनसे डरे नहीं, बल्कि सामना करें। जो विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं वे पहले एक लक्ष्य निर्धारित करें तथा समय-सीमा पर उसे पूरा करें। प्रतिदिन छह से आठ घंटे की पढ़ाई करना जरूरी है और सफलता का मूलमंत्र यही है कि सबसे पहले आप स्वयं तय करें कि आप जीवन में क्या बनना चाहते हैं। इसका दृढ़ निश्चय करें और लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में लग जायें। आपको सफलता जरूर मिलेगी।



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