रंगपंचमी हुई कोरोना पॉजिटिव

 पुराना इंदौर 



भंग की तरंग में आंखें मूंद कर खो जाइए रंगों के गुबार में 


🔹कीर्ति राणा की कलम से,,,,,,



लंबे समय से प्रेयसी का इंतजार जब बैचेनी में बदल जाए तब यही रास्ता बचता है कि आंखें मूंद ली जाएं और बंद आंखों में उभरती प्रेयसी की छवि को ही अपने पहलु में बैठे होने का अहसास कर लिया जाए।साल में एक बार सारे शहर को जिस रंगपंचमी का इंतजार रहता है वह इस दूसरे साल भी आ कर, नहीं आई है।अब यही रास्ता बचा है कि भांग ठंडाई के साथ कुछ मीठा हो जाए और जब तरंग का अहसास होने लगे तो आंखें मूंद कर दो साल पहले की रंगपंचमी को याद करते हुए रंग वाले कड़ाव में डुबकी लगा कर टोरी कार्नर, बियाबानी या बाणगंगा वाली गैर का ध्यान करते हुए उसमें शामिल हो लिया जाए। कितना आसान है रंगपंचमी को महसूस करना पर क्या बिना भीगे, ठिठोली किए बिना, उल्टी-सीधी हरकतें किए बिना, चमकीली पन्नियों वाली टोपी पहन कर, ठिठोली किए बिना और स्कूटर-कार पर सवार हो रंगपंचमी वाले इंद्रधनुषों को देखने निकले परिवारों के खूबसूरत चेहरों को ताकते, गुलाल भरी मुठ्ठियों का सही निशाना लगाए बिना रंगपंचमी का मजा आ सकता है क्या? 


कहां तो बीते साल कलेक्टर लोकेश जाटव रंगपंमी की गैर को यूनेस्को की विश्व धरोहर वाली सूची में शामिल कराने के लिए संकल्पित थे लेकिन इस कोरोना ने उनके सपनों पर तो पानी फेर ही दिया और रंगपंचमी को ऐसा बदरंग किया कि इस दूसरे साल होली भी मन मसोस कर मनी और रंगपंचमी पर भी शहर के पश्चिम क्षेत्र में सन्नाटा ही छाया रहा।कलेक्टर मनीष सिंह को होली-रंगपंचमी की याद तो रही लेकिन लॉकडाउन वाली सख्ती के रूप में। होली-धुलेंडी पर न तो शोक का रंग डला और न ही पंचमी पर रंगों के इंद्रधनुष नजर आएंगे, मिसाइलों से ऊंची इमारतों पर उड़ाए जाने वाले रंगों से इंदौर का आसमान सतरंगी नहीं होगा, न ही ऐतिहासिक राजवाड़ा हुरियारों की मस्ती का गवाह बन सकेगा। 


ऐसा तो सपने में भी नहीं सोचा था यह तो वैसे ही हुआ कि कोई पोहे तो खिलाए लेकिन उसमें सेंव नदारद हो।शहर वही, लोग वही लेकिन रंगीन मिजाज गायब है।कहां तो अनंत चतुर्दशी की झांकियों को देखने आसपास के शहरों से लोग इंदौर आते थे वैसे ही पूर्वी क्षेत्र के लोग रंगपंचमी की रंगीनियां देखने का प्लॉन एक दिन पहले ही बना लेते थे लेकिन इस साल सारे प्लॉन कोरोना वाले लॉकडाउन ने फेल कर रखे हैं। इस उम्मीद में पिछले साल मन मसोस कर रह गए थे कि चलो अगले साल खूब रंग खेलेंगे।बचीखुची कसर रंगपंचमी की गैर में पूरी कर लेंगे, अफसोस है तो यह कि जनजीवन को बरबाद करने पर आमादा कोरोना की दूसरी लहर ने इस दूसरे साल भी धुलेंडी-रंगपंचमी का रंग उड़ा रखा है।


कपड़ा मिल की झांकियों की तरह रंगपंचमी की गैर भी देश में अपनी पहचान रखती है।दूरदराज के गांवों में भी पंचमी का वैसा उल्लास गायब है तो इंदौर की क्या बिसात।होल्कर स्टेट के वक्त शहर में पांच दिन होली का उत्सव रहता था।रंगपंचमी पर होल्कर रियासत के राजे-रजवाड़े राजवाड़ा पर नाच-गाने की महफिल के साथ रंग-गुलाल से भरे थाल लिए बैठे रहते और प्रजा पर गुलाल उड़ाते और फिर लाव-लश्कर के साथ आसपास के मार्गों पर रंग खेलने निकल पड़ते।इसी तरह दशहरे पर राजबाड़ा पर प्रजाजन को पान वितरित किए जाते थे। कोठारी मार्केट के सामने जो सरकारी तंबोली की दुकान है वो चौरसिया परिवार तब पान की व्यवस्था करता था, सरकारी तंबोली का खिताब इन्हीं सारे इंतजामों के कारण मिला था उन्हें। 


राजा तो रहे नहीं लेकिन रंगपंचमी रह गई और उसका रूप भी निखरता गया।1947-48 में पहली गैर टोरी कार्नर से निकली तब बाबूलाल गिरी (जो पार्षद भी रहे) और उनके भाई छोटेलाल ने शुरुआत की थी।उस जमाने में रामचंद्र भिंडी पहलवान, गिरधर गोपाल राठी, माणकचंद, मनोहर लाल काला, रघुवीर सिंह ठेकेदार, कस्तूर चंद विनोदी, बसंत पंड्या, गोकुलदास भूतड़ा, कविराज सत्यनारायण सत्तन, उनके भाई शिवाजी शर्मा आदि इस गैर समिति के सलाहकार-सहयोगी थे। 


तब टोरी कार्नर पर विशालकाय कड़ाव में रंग घोलकर रखा जाता था और आसपास के लोगों को टांगाटोली कर कड़ाव में डुबा देते थे। इसके साथ ही खेतों में दवाई छिड़कने वाले पंप लेकर समिति के लोग घर घर पहुंचते और रंगों की फुहारों के बीच लोगों को गैर में शामिल होने का निमंत्रण देते थे।


शहर की इस पहली गैर की कमान बाद में शेखर गिरी, कोमल गिरी और क्षेत्र के अन्य सहयोगियों शिव गुप्ता, शेखर यादव, चंदू चौरसिया, अनिल जैन, कमल काला आदि के हाथों में आ गई।गैर में जिन आकाश छूने की होड़ वाले विभिन्न रंगों के गुबार मन मोह लेते हैं उसका श्रेय स्व रमेश शर्मा बोरिंग को जाता है। हाइड्रोलिक ट्रेक्टर पर बोरिंग पंप से 300 फीट दूरी तक रंगों के गुबार उठते-उड़ते नजर आते थे। इसी गैर के बाद कांग्रेस नेता-पार्षद रहे स्व राकेश शर्मा, उपेंद्र शुक्ल अप्पाजी, प्रेम स्वरूप खंडेलवाल उस्ताद ने संगम कार्नर गैर शुरु की जो अब कमलेश खंडेलवाल मित्रमंडल निकालता है।इसीतरह रसिया कार्नर से अशोक पाटोदी ने गैर शुरु की जो अब राजपाल जोशी निकालते हैं।बियाबानी से स्व रामकुमार पांडे ने, उजागर सिंह चड्डा, पत्रकार सुभाष जैन (आज की जनता), आरसी सलवाड़िया ने भी कुछ वर्ष गैर निकाली।ओम बंसल और सुभाष खंडेलवाल ने भी फाग यात्रा कुछ वर्षों तक निकाली। मालवा क्लब की गैर के साथ ही बाणगंगा क्षेत्र से गोलू शुक्ला और दीपू यादव भी गैर निकालते रहे हैं।नृसिंह बाजार स्थित राधा-कृष्ण मंदिर से विधायक रहे स्व लक्ष्मण सिंह गौड़ ने फाग यात्रा शुरु की जो अब विधायक मालिनी गौड़ की देखरेख में निकलती है। 


टोरी कार्नर नाम से दद्दू तिवारी का रिश्ता

जिस टोरी कार्नर (मल्हारगंज) से शहर की पहली गेर की शुरुआत हुई है, उस तिराहे का टोरी कार्नर नामकरण पुराने समाजवादी दद्दू तिवारी (गंगा प्रसाद तिवारी) ने किया था। पुराने समाजवादियों में दद्दू तिवारी का नाम जाना पहचाना है। उनकी इस तिराहे पर नियमित रात्रिकालीन बैठक थी। इंग्लैंड की कंजरवेटिव पार्टी जिसे "टोरी" भी कहा जाता है के अनुसार रखा गया है। क्योंकि दद्दू तिवारी खांटी समाजवादी थे, तथा वहां बैठने वाले कांग्रेस एवं अन्य लोगों को वह कंजरवेटिव मानते थे, इसलिए उन्हें "टोरी" कहकर संबोधित करते थे।

एडिशनल एसपी मनीष खत्री ने तब 

कह दिया था गैर नहीं निकलने दूंगा


टोरी कार्नर गैर के संयोजक शेखर गिरी बीते वक्त को याद करते हुए कहने लगे जब देश में मोदीजी का सूट और प्रदेश में व्यापम कांड का हल्ला था तब हमने गैर के आकर्षण में मोदीजी के सूट के साथ ही व्यापम कांड वाले एक हजार गुब्बारे उड़ाना तय किया था। एक रात पहले एडिशनल एसपी मनीष खत्री ने आकर अपने अंदाज में समझाया यदि यह सब नाटक करोगे तो गैर नहीं निकलने दूंगा। हमने भी सोचा बैठे-ठाले क्यों मुसीबत मोल लें, यह प्लॉनिंग निरस्त कर दी। 


🔹पहले भी दो बार निरस्त करना पड़ी थी 

कोरोना की वजह से लगातार दूसरे साल गैर नहीं निकल रही है।इससे पहले भी दो बार टोरी कार्नर वाली गैर नहीं निकली थी। एक तो तब जब बाबूलाल पाटोदी आरिफ बेग के हाथों विधानसभा चुनाव हार गए थे और एक बार तत्कालीन महापौर लक्ष्मण सिंह चौहान के निधन के कारण यह गैर निरस्त करना पड़ी थी। 

इस गैर की शालीनता-अनुशासन का आलम यह था कि परिवारों की महिलाएं नाचते-गाते शामिल होती थीं। जब गैर कृष्णपुरा तक पहुंचती तब बड़ी संख्या में युवाओं की टोलियां मौजमस्ती करते शामिल होती थीं। 

🔹150 बोरी गुलाल अब भी पड़ा है

श्पेखर गिरी ने बताया पिछले साल तो यकायक गैर की अनुमति निरस्त कर दी गई थी।कोरोना कर्फ्यू तो बाद में लगा, रंगपंचमी पिछले साल 14 मार्च की थी।कलेक्टर लोकेश जाटव खुद प्रयासरत थे कि यूनेस्को की धरोहर सूची में इंदौर की गैर को स्थान मिले। उनके और डीआयजी रुचिवर्द्धन मिश्रा के आश्वासन पर ही गैर निकालने की तैयारियों के तहत बैंडबाजों, पानी के टैंकर, विदेशी कलाकारों, डीजे आदि बुक कर के बयाना भी दे दिया था। अचानक निरस्त करने के आदेश का असर यह हुआ कि बयाने की राशि डूब गई।इस साल कम से कम यह अच्छा हुआ कि शहर के सभी गैर आयोजकों को यह पहले से ही जानकारी मिल गई कि इस साल भी गैर की अनुमति नहीं मिलेगी। 


रंगपंचमी निरस्त होने की व्यथा को दर्शाता 


गोपियों  को सीख वाला उद्धव प्रसंग


ब्रजभाषा के मूर्धन्य कवि जगन्नाथ दास रत्नाकर ने भी उद्धव प्रसंग में कृष्ण से मिलन को बैचेन गोपियों को ऐसा ही परामर्श दिया था उद्धव ने : 


चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम-सुन्दर कौ

जोग के प्रयोग में हियौ तौ बिलस्यो रहे।

कहै ‘रतनाकर’ सु-अन्तर-मुखी है ध्यान ।

मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै।।

ऐसे करौं लीन आतमा को परमातमा में

जामै जड़-चेतन-बिलास बिकस्यौ रहै।

मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि

सो तौ सब अन्तर-निरन्तर बस्यौ रहै।।


(अर्थ : उद्धव गोपियों से कह रहे हैं कि यदि तुम श्याम सुन्दर अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ संयोग (मिलाप) को अपने अधिकार में करना चाहती हो, तो अपने हृदय को योग साधना में आनन्द के साथ लीन रखें।उद्धव गोपियों को कृष्ण का ध्यान करने के लिए हृदय में स्थित आत्मा की ओर उन्मुख होने को कहते हैं। मनुष्य के सुन्दर हृदयरूपी कमल में ब्रह्म की ज्योति जलती रहती है, उसी ब्रह्म की ज्योति के ध्यान में गोपियों को लीन रहना चाहिए। उद्धव का यह कहना है कि कृष्ण सच्चे अर्थ में ब्रह्म के स्वरूप हैं एवं गोपियाँ यदि उन्हें पाना चाहती हैं, तो उन्हें अपनी आत्मा को परमात्मा अर्थात् ब्रह्म में इस प्रकार लीन कर देना चाहिए, जिससे उनके हृदय में जड़ और चेतन के प्रति आनन्द प्रकट होता रहे। ब्रह्म का साक्षात्कार करने वाले योगी को, जैसे जड़ और चेतन में आनन्द की अनुभूति होती रहती है, वैसे ही गोपियों को भी अपनी आत्मा में कृष्ण की उपस्थिति की अनुभूति होने लगेगी। मोह वश जिसके वियोग का अनुभव करके गोपियाँ क्षुब्ध (दुःखी) होती हैं तथा प्रिय कृष्ण को अपने से पृथक् समझती हैं, वह तो गोपियों के ही नहीं, अपितु सभी के हृदय में सदैव विद्यमान रहते हैं।)