आत्म चिंतन कीजिए,,,, देश में लाशों के ढेर पर हरिद्वार में आस्था की डुबकी,,,, धर्म के ठेकेदारों इतिहास तुम्हें कभी माफ नहीं करेगा

 हरिद्वार में चल रहे कुंभ और इसमें कुछ संतो की मौत , कुछ की कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आने के बाद मन हुआ कि कुछ लिखा जाए ,लेकिन लिखने से पहले कुछ समझने का भी विचार मन में था समझने की कोशिश की तो पता चला कि वहां मौजूद लगभग सभी कथित संत नहीं चाहते थे कि हरिद्वार का कुंभ सीमित किया जाए, अग्नि अखाड़े के सचिव महंत साधना नंद ने कहा था कि कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को दुख क्यों दिया जा रहा है , देश गुलाम था, मुस्लिम शासक और अंग्रेजों के शासन में भी प्रताड़ित नहीं किया गया तो अब क्यों। महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी ने विरोध करते हुए कहा था कि कोरोना के प्रकोप से शासन भयभीत है संत नहीं,,, संत अपनी परंपरा अनुसार ही कुंभ का मेला लगाएंगे और अब जब कुंभ के मेले को समाप्त करने की कुछ  अखाड़ों ने घोषणा कर दी है तो कुछ को अभी भी यह भ्रम है कि गंगा स्नान से सारे कष्ट दूर हो जाएंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देश के ख्यात संत से मेले को प्रतीकात्मक रखने की अपील की तो संत ने फिर भी यह जिद रखी की सीमित संख्या में लोग आएं ,,,,,,लोग ना आए,,,, यह धर्म संदेश देने में कंजूसी की गई। एक टेलीविजन चैनल ने जब कुछ सवाल किए तो जवाब मिला कि अकेले कुंभ से कोरोना नहीं बढ़ रहा है, महाराष्ट्र की स्थिति भयावह है , उस अनुपात में हरिद्वार में प्रकोप या संक्रमण नहीं फैला ,उन्होंने पंजाब राजस्थान का भी लगे हाथ उदाहरण देकर हरिद्वार के कुंभ में जुटी भीड़ को जायज ठहराने की भरपूर कोशिश की।

स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने की ललक ,भीड़ को देखते ही स्वयं को ईश्वर माननीय का भ्रम, प्रकृति से भी लड़ने का छलावा, भक्तों की जेब पर निगाहे टीकाने वाले और यह घोषणा करने वाले की कुंभ समेटने की शक्ति किसी के पास नहीं है, हर वक्त यह दंभ भरने वाले की हम ही तो विश्व को राह दिखाने वाले हैं ।सत्य के मार्ग पर ले जाने वाले हैं। श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को भुनाने की

 जिद ,अंध आस्था और स्वयं को ईश्वरीय सेवा से ऊपर मानने की दमभोक्ती करने वाले कथित धर्म के सौदागरों की वजह से आने वाले समय में पूरे देश में कुंभ स्नान से लौट कर आए श्रद्धालु कोरोना का प्रसाद बाटेंगे ,इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है। आखिर क्या वजह रही कि 1 अप्रैल से जब देश मे कोरोना का कहर शुरू हुआ और लाशों की गिनतियां गड़बडाने लगी तब जबकि पूरा देश त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहा था हर गली मोहल्ले में लाशों पर रुदन की आवाजें गूंज रही थी, अपनों के खोने का दर्द इतना था कि आंखों में आंसू कम पड़ गए तब पूरे देश को और पूरे विश्व को राह दिखाने वाले या यूं कहे की राह दिखाने की ताकत रखने वाले देश के कथित संत हरिद्वार में कुंभ स्नान के नाम पर गंगा स्नान कर पाप के नष्ट होने का प्रवचन दे रहे थे ।सवाल यह है कि आखिरकार हरिद्वार में लाखों लोगों के पहुंचने पर भी निडर होकर इन भक्तों को गंगा स्नान से ना रोकना और इनकी हौसला अफजाई के लिए बड़े-बड़े पंडाल लगाकर भंडारा चलाना, ख्यात सिने कलाकारों को मंच पर गवाना और नचाना साथ ही भागवत के पाठ करना क्या सचमुच जरूरी था। सवाल यह भी है की कोरोना से मरने वालों की लाश की आग और हवन की आग में अंतर समझने में भूल कैसे हो गई। लाखों-करोड़ों के पांडाल में बैठकर जनता को राह दिखाने वाले खुद राह कैसे भूल गए। आखिरकार 1 अप्रैल को देश में कोरोना के भयावह आंकड़े सामने आने के बाद यह अपील क्यों नहीं की गई की कुंभ का स्नान करना जरूरी नहीं है। पहला धर्म अपने परिजनों की रक्षा करना दुख में उनका साथ देना है,,,,,, धर्म तो यह भी कहता है कि देश की रक्षा करना चाहिए,,,, भले ही इसके लिए परिवार की रक्षा न कर पाए,,,,, धर्म तो यह भी कहता है कि समय के हिसाब से कार्य करना उचित है,,,,, धर्म तो यह भी कहता है कि खुद के सुख के लिए दूसरों को दुख देना अधर्म है ,,,,तो फिर इस तरह के धर्म उपदेशों की अवहेलना कर कुंभ में पहुंचने वाले लाखों करोड़ों श्रद्धालुओं को यह उपदेश क्यों नहीं दिया गया की इस स्नान के बाद पूरे देश में पहुंचकर, घर मोहल्ले को शमशान मैं तब्दील करने से अच्छा ही की यह कुंभ का स्नान आप ना करें।

इधर अब अलग-अलग अखाड़ों में जाकर साधुओं के RT-PCR टेस्ट किए जा रहे हैं। 17 अप्रैल से टेस्टिंग और बढ़ाई जाएगी ।0 से 14 अप्रैल के बीच कोरोना वायरस के 1,701 नए संक्रमित मिले हैं।यह तब है जब जांच और जांच रिपोर्ट आने की गति सुस्त है  इसने उन चिंताओं की एक तरह से पुष्टि हो गई है कि विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन के कारण कोविड के मामले बढ़ सकते हैं।


इस बीच, गुरुवार को अखिल भारतीय श्री पंच निर्वाणी अखाड़े के महामंडलेश्वर कपिल देवदास (65) की मौत हो गई। महामंडलेश्वर कोविड जांच में संक्रमित पाए गए थे। उनको सांस लेने में तकलीफ थी। कई दिनों से तेज बुखार भी आ रहा था। वे कुंभ मेले में ही थे। 12 अप्रैल को महामंडलेश्वर का स्वास्थ्य अचानक बिगड़ गया था, जिसके बाद उन्हें देहरादून के अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

कोविड के साए में महाकुंभ स्नान से हरिद्वार में महामारी का खतरा मंडराने लगा है। 12 से 14 अप्रैल तक तीन स्नान पर गंगा में 49 लाख 31343 संतों और श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई है। जिले में 1854 पॉजिटिव मरीज मिले, जो गुरुवार को बढ़कर 2483 पहुंच गए। कई संत और श्रद्धालु बीमार भी हैं। 


रुड़की विवि के वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ इससे संक्रमण का फैलाव कई गुना बढ़ने की आशंका से चिंतित हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि कोरोना का वायरस ड्राई सरफेस की तुलना में गंगा के पानी में अधिक समय तक एक्टिव रह सकता है।


गंगा का पानी बहाव के साथ वायरस बांट सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि संक्रमित व्यक्तियों के गंगा स्नान और लाखों की भीड़ जुटने का असर आगामी दिनों में महामारी के रूप में सामने आ सकता है। 

इस बीच निरंजनी अखाड़े के साधु संतों की छावनियां 17 अप्रैल को खाली कर दी जाएंगी। 

जान लें इस कोरोना का असली असर तो तब पता चलेगा जब यहा आये लाखों लोग संक्रमण ले कर अपने गाँव-कस्बे में जायेंगे . जान लें इस बार का वायरस संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में महज एक मिनिट रहने पर एक साथ आठ से दस लोगों को चपेट में लेता है 

खुद को श्रेष्ठ बताने का दम्भ, प्रकृति से भी लड़ने की ताकत का छद्म दावे और हर समय दुसरे धर्म या आस्था से तुलना आकर खुद को निरापद बताने की मूर्खता की हद तक कोशिश के चलते आने वाले दिन में गंगा के तट के वाशिंदों और कुम्भ से पुन्य लूटने वालों के जरिये कोरोना-प्रसाद सारे देश में होगा, वैज्ञानिक बता चुके हैं कि गर्मी के बढते ही अर्थात- मई जून तक इसकी मार चरम पर होगी .

इध


र अभी भी स्व नाम धन्य संतों का कहना है कि अकेले कुंभ मेले में तो कोरोना नहीं बढ़ रहा है,,, महाराष्ट्र की स्थिति से तुलना करते हुए हैं उनका कहना है कि स्थिति महाराष्ट्र में ज्यादा भयावह है ,,उस अनुपात में हरिद्वार का आंकड़ा बहुत छोटा है,, अब यह दम भक्ति करने वाले देश के कथित सबसे बड़े संत को यह कौन समझाए की लाखों लोग जब देश के कोने कोने में पहुंचकर करोड़ों लोगों की जान को आफत में डालेंगे और उस वक्त के आंकड़े जब सामने आएंगे तो यह बयान कितना तर्कसंगत माना जाएगा, अभी भी संतों का मानना है कि आस्था पर चोट नहीं होना चाहिए अभी भी यह संदेश नहीं दिया जा रहा है की मन चंगा तो कठौती में गंगा,,, संदेश यह दिया जा रहा है कि बाहर से आने वाले साधक विचार करें,,,,, आने वाले श्रद्धालु सीमित संख्या में आए ,,,,,,धन्य है इस देश के संत जो एक लाइन का सिंपल निर्देश अपने भक्तों को जारी करने के बारे में अभी भी सोच रहे हैं, जब पूरा देश त्राहि-त्राहि कर रहा है, श्मशान में और कब्रिस्तान में लाशों के अंतिम संस्कार के लिए जगह तक उपलब्ध नहीं है ,ऊपर जाने के लिए भी 8 से 10 घंटे की वेटिंग है तब एक लाइन का यह संदेश की,,,,,, कृपा कर आप हरिद्वार कुंभ में स्नान के लिए नहीं आए,,, अपनी और धर्म की तोहीन समझा जा रहा है। ट्विट किया जा रहा है,,,, लेकिन ट्वीट की भाषा ठीक से पढ़ो तो संदेश समझ में आ जाएगा की हमारी तरफ से कोई रोक नहीं है और ना ही हम आने को रोक रहे हैं बस इतना कह रहे हैं की सीमित संख्या में आओ। धर्म की दुकान चलाने वाले इन ठेकेदारों को अभी भी यदि देश की जनता ने समझने में भूल की तो याद रखना अपनों की लाश पर अभी तो रोने वाले भी मिल रहे हैं आगे अंधभक्ति के चलते रोने वाले ढूंढना रेत से पानी निकालने जैसा होगा।

और अंत मे,,,,

यह देश की जनता का भी कर्तव्य है कि वह अपनी और देश की सुरक्षा के लिए कोविड-19 के प्रोटोकॉल का पूरी तरह मन कर्म वचन से पालन करें शादी विवाह जन्मोत्सव दोस्तों के साथ पार्टियां सामूहिक आयोजन और मृत्यु भोज जैसे सामूहिक कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी ना करते हुए ऐसे कार्यक्रमों को सीमित करें क्योंकि नागरिकों की जान की रक्षा करना सिर्फ सरकार का ही काम नहीं नागरिकों का स्वयं का भी काम है सरकार हर मोर्चे पर सफल हो यह भी जरूरी नहीं लेकिन देश की जनता यदि तय कर ले कि वह अपनी आवश्यकताओं को सीमित करेगी और कोरोना प्रोटोकॉल का हर हाल में पालन करेगी तो कोरोना की इस महामारी को ठेंगा दिखाया जा सकता है।

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