आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज के जाबांज डॉक्टरों को सेल्यूट,,,,,,, हर कदम पर जान का खतरा,लेकिन अपनी जान की बाजी लगाकर दूसरों की जान बचाने का जज्बा कम नहीं हुआ,,,,,, केरल के अभिषेक की पत्नी गर्भवती थी,लेकिन कोरोना वायरस के बीच काम करता रहा , संतान की सूरत देखने के पहले दुनिया को कह दिया अलविदा

 

उज्जैन।भारतीय मेडिकल एसोसिएशन के प्रेजिडेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर जेए जयालाल के मुताबिक़ covid-19 से मरने वालों में 780 डॉक्टर हैं, जो मरीजों का इलाज करते वक्त चपेट में आए और फिर दुनिया से अलविदा कह गए, डाक्टरों के अलावा नर्स और पैरामेडिकल स्टाफ में कितनी मौतें हुई इसका आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है।








2 से लगाकर 5या 10 घंटे पीपीई किट पहनकर न आप खाना खा सकते हैं, न पानी पी सकते हैं, न वॉशरूम जा सकते हैं और न किसी से मदद ले सकते हैं, ऐसे में यदि कोविड-19 अस्पतालों में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ मरीजों की जान बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं कर रहे हैं तो सच मानिए ऐसे लोग देवता के तुल्य है।

आप स्वयं इस बात का अंदाजा लगाइए की अगर आपको महीनों खतरों के बीच ऐसी ही काम करना पड़े तो आपकी हालत क्या होगी,पीपीई को पहनने के आधे घंटे के बाद ही आप पसीने से तर हो जाते हैं क्योंकि आप ऊपर से नीचे तक पैक होते हैं,इसके अलावा

एक वॉर्ड से दूसरे वॉर्ड जाने वाले डॉक्टर, नर्स, वॉर्ड हेल्पर्स, लैब असिस्टेंट, रेडियोलॉजी स्टॉफ़, सफ़ाई कर्मचारी और दूसरों के लिए ज़्यादा समस्या है

 पीपीई किट पहनने के बाद पंखे के आगे या एसी रूम में हवा नहीं लगती ऐसे में मानसिक तनाव की स्थिति का भी अंदाजा लगाया जा सकता है, यह सच है कि पिछले करीब 14 महीनों कोरोना पैंडेमिक से जूझते इस देश के लाखों डॉक्टर, पेरामेडिकल स्टॉफ़ , और उनसे जुड़ा अन्य स्टाफ बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में काम कर रहे हैं, कॉविड अस्पताल में काम करने वाले डॉक्टरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह भी थी कि ज़िंदगी में पहली बार कितने ही परेशान लोगों को 'ना' कहना पड़ा, लोग वेंटिलेटर, ऑक्सीजन वाले बेड के लिए आ रहे हैं, लेकिन इतने मुश्किल समय में भी  लोगों को 'ना' कहना पड़ा बेड खाली नहीं थे यहां तक की अनेक अस्पतालों में अपने ही स्टाफ कर्मचारियों को और स्टाफ डॉक्टर को संक्रमित होने के बाद बेड उपलब्ध नहीं हो पाए, यहां तक की ऐसी स्थिति में स्टाफ कर्मचारी की मौत तक हुई है।

कोरोना ने कितनी नर्से और दूसरे मेडिकल स्टाफ की जान ली है इसको लेकर अभी तक कोई प्रमाणिक जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन यह सच है कि मरने वालों का आंकड़ा बहुत बड़ा है।

जरा सोचिए जब आप तनावपूर्ण वातावरण में काम करते हैं तो कितनी जल्दी हताश हो जाते हैं लेकिन आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने बेहद तनावपूर्ण वातावरण में काम करने के बाद भी मरीजों की जान बचाने का जज्बा कायम रखा, अस्पताल के कॉविड 19 नोडल अधिकारी डॉक्टर सुधाकर वैद्य जो अप्रैल में मरीजों का इलाज करते करते कोरोना पॉजिटिव हो गए ,लेकिन उन्होंने अपनी सोच को नेगेटिव नहीं होने दिया घर बैठकर ही 1,,,,1 मरीजों की जानकारी लेते रहे और उस दिन का इंतजार करते रहे जब होम आइसोलेशन से निकलकर फिर मरीजों की जान बचाने फील्ड में पहुंच सके ,वह कहते हैं कि "जब आप पर इतना मानसिक दबाव है, आपके चारों ओर कोरोना ही कोरोना है, लोग सांस नहीं ले पा रहे हैं, लाशों की संख्या भी देखकर डर लगता है,



 ऐसे हालात में लगातार काम करना डिप्रेसिंग होता है और "कभी-कभी लगता है कि क्या इतना काम करना चाहिए या छोड़ देना चाहिए, लेकिन दिल यही कहता है कि ऐसे मौके जीवन में फिर शायद लौट कर नहीं आएंगे जब मरीज की सारी आशा आप पर टिकी हो ,क्योंकि आम दिनों में तो मरीज के लिए सैकड़ों अस्पतालों के दरवाजे खुले होते हैं लेकिन कोरोना के समय जिस अस्पताल में बेड उपलब्ध हो गया वही अस्पताल मरीज के लिए मंदिर हो गया और अस्पताल के डॉक्टरों को देवदूत के रूप में मरीज और उसके परिजन देखने लगते थे।

 चाहकर भी लोगों की मदद न कर पाना, रात में किसी भी समय ड्यूटी का कॉल आ जाना, कई दिनों तक नींद पूरी न हो पाना, सुबह से शाम तक लगातार तनावपूर्ण वातावारण में काम करना, तबीयत ठीक न होने के बावजूद काम करना, अपने आसपास लोगों की लगातार मौत और रोते-बिलखते रिश्तेदारों को देखना- ऐसे तनावपूर्ण माहौल में लगातार काम करना किसी को भी थका सकता है, लेकिन आरडी गार्डी मेडिकल कॉलेज के जूनियर और वरिष्ठ डॉक्टरों के अलावा अस्पताल के स्टाफ के मिलाकर 40 से अधिक लोगो के पॉजिटिव आने के बाद भी पूरा अस्पताल काम पर लगा रहा, अस्पताल के अनेक जूनियर डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ कोरोना पॉजिटिव आये, पॉजिटिव आने वालों में डॉक्टर सुधाकर वैद्य के अलावा अनुदीप दुबे, अमित दुबे, अभय प्रकाश त्रिपाठी, डॉक्टर समीक्षा मिश्रा, डॉ धवल भोजानी, डॉक्टर पुष्पेंद्र पटेल जैसे वरिष्ठ डॉक्टरऔर अभिषेक जैसे काम को समर्पित नर्सिंग स्टाफ के  ट्यूटर,और अनेक जूनियर डॉक्टर शामिल है, कोविड आज  पॉजिटिव होने वालेअधिकांश चिकित्सक 7 और 15 दिन में ठीक होकर वापस ड्यूटी पर लौट आए, लेकिन सबसे दर्दनाक कहानी  अभिषेक की है, अभिषेक उम्र 32 वर्ष, निवासी केरल, नर्सिंग ट्यूटर था और कोरोना मरीजों के संपर्क में आने के बाद 29 अप्रैल को कोरोना पॉजिटिव हो गया, लगभग 10 दिन के इलाज के बाद 8 मई को उसने दम तोड़ दिया, 1 साल पहले शादी करने वाले अभिषेक की पत्नी, मौत के वक्त गर्भावस्था में थी, अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक उसकी मौत खून का थक्का जमने से हुई ,उसे 15 लीटर ऑक्सीजन पर रखा गया था ,रात दिन डॉक्टर उसे बचाने में जुटे थे लेकिन नहीं बचा पाए। लंबे समय से परिवार से दूर रहने वाले यह एक डॉक्टर की कहानी है, ऐसे शहर में अनेक डॉक्टर हैं जो प्रदेश के बाहर से आए हुए हैं और कोविड-19 की ड्यूटी के दौरान अपने घर नहीं जा सके।

 "पहले डॉक्टर अपनी जान की बाज़ी लगाकर काम करते थे. लेकिन इस बार अपने परिवारों की  ज़िंदगी भी खतरे में डाल  कर काम करते रहे, ऐसे चिकित्सकों और उनके साथ के स्टाफ के जज्बे और हौसले को हम भी सैल्यूट करते हैं और आप भी कीजिए।

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