फॉदर टेरेसा,,,,,,364 के पिता बनकर संवारा जीवन,वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया,जिनका कोई नही उनके सुधीर भाई गोयल है,,,,

 

उज्जैनआधुनिक युग में जब परिवार सीमित हो रहे हैं और परिवार में एक या दो बच्चे का पालन पोषण मुश्किल हो रहा है ऐसे में उज्जैन के एक शख्स सुधीर भाई ने सेवाधाम में रहने वाले 364 बच्चों और प्रौढ़ों को पिता का नाम दिया, इन बच्चों और प्रौढ़ों के आधार कार्ड और निर्वाचन परिचय पत्र में पिता के नाम की जगह सुधीर भाई गोयल का नाम है, लोग इन्हें फॉदर टेरेसा भी कहते है, सुधीर भाई ने जिन्हें अपना नाम दिया इसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा दिव्यांग है जो बौद्धिक, शारीरिक मानसिक और बहु दिव्यांगता के क्षैत्र में आते है। जहां सेवाधाम का आत्मीय वातावरण आज आने वाले को आकर्षित करता है वहीं आने वाले के लिए यह कोतूहल का विषय भी होता है कि यहां रहने वाले सुधीर भाई  को पिताजी के रूप में सम्मान देकर बुलाता है। सुधीर भाई ने अनेक ऐसे बच्चों को अपनाया जो व्यसन के शिकार थे, बीड़ी, तम्बाकू, शराब, अफीम, गांजा, भांग, व्हाईटनर आदि अनन्य प्रकार के व्यसनों के शिकारों को अपनाकर एक नया जीवन प्रदान किया। उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ा

 उनमें एक बच्चा रमेश (परिवर्तित नाम) खूब उधमी था और अनेक प्रकार की बुरी आदतों और लतों का शिकार था लेकिन आज आश्रम के माहौल में अनेक प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त कर वह स्वावलम्बी बन गया है। वहीं एक अन्य जो 7 साल से आश्रम में है यहां के दैनांदिन कार्यों में सहयोगी है। इसी प्रकार से अनेक ऐसे मनोरोग के शिकार बच्चे जो बेड़ियों से जकड़े हुए थे और समाज व घर परिवार से  बहिष्कृत-तिरस्कृत थे उन्हें मुख्य धारा से जोड़ा। कोई गौशाला में कार्य कर रहा है, कोई भोजनशाला में कोई परस्पर सेवा में काम कर रहा है। यहां का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण बिन्दु है कि जो भी व्यक्ति, जो भी दुखी जो संक्रमित, जो भी मनोरोग से शिकार हो या अनेक अनेक प्रकार की व्याधियों या बिमारियों को लेकर आता है स्वस्थ होकर दूसरों को स्वस्थ करने में लग जाता है। 

सुधीर भाई का कहना है यह मैरा परिवार है, यह मेरा समाज है यही मेरा कुटुम्ब है 700 लोगों से ज्यादा का एक ऐसा अद्भूत परिवार, एक ऐसा विशाल परिवार जहां सम्पूर्ण भारत से आने वाले एक ही आत्मीयता की डोर में बंधे हुए है। हर कोई एक दूसरे से प्रेम करता है, हर कोई एक दूसरे को चाहता है, यहां किसी प्रकार का कोई भेदभाव नही किया जाता। यहां समय पर चाय, नाश्ता, दो समय का भोजन, दूध, फल, बिमारों को औषधी नित्य-नित्य यहां यह क्रम एक व्यवस्था के रूप में चलता रहता है। सबके लिए एक जैसा वातावरण उपलब्ध होता है और हर व्यक्ति अगर कोई उसको परेशानी है आवश्यकता है तो अपने पिता के रूप में सुधीर भाई को ही बताते है वहीं उनकी सहधर्मिणी कांताजी के साथ बेटी मोनिका एवं गोरी भी इनके कार्यो में सहयोग प्रदत्त करती है। वे भी अपने भाईयों के समान और अपने बच्चों के समान उनको मानती है। आज सेवाधाम का वातावरण एक अद्भूत, सुरम्य, प्रदुषण मुक्त पर्यावरण में है। 


50 से अधिक बेटे बेटियों का विवाह कर चुके हैं


यहां नित्य बच्चें श्रमदान भी करते है और पढ़ते है और विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त करते है। हस्तशिल्प, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई के साथ कम्प्यूटर एवं अनेक प्रशिक्षणों में निपुण हो रहे है। सुधीर भाई ने अब तक पिता बन कर 50 से अधिक बेटे और बेटियों का विवाह भी किया है जो आज सुखी और अच्छा गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे है। यह कई बच्चों के नाना-दादा बन चुके है। 17 साल की उम्र में सुधीर भाई ने दो बेटियों का कन्यादान किया जो नारी निकेतन उज्जैन की बेटियां थी, आज उनके बच्चे भी सेवाधाम आते है और वह भी उन्हें नाना के रूप में सम्मान देते है। इस प्रकार से एक ऐसा अनवरत क्रम इस आश्रम के साथ चल रहा है।



20 से अधिक प्रदेशों के बच्चों को अपनाकर पिता का नाम दिया


 कई बच्चे सड़कों पर थे, कई बच्चे यहां जन्म लिए और उन सब में एक ऐसा एकात्मता है एक ऐसा आत्मीय रिश्ता है, एक ऐसा अलग ही वातावरण है जिसे देखकर सब कोई आश्चर्यचकित हो जाता है, उन्हें विश्वास नही होता। कहीं भी किसी भी स्थिति में आज मध्यप्रदेश ही नही भारत के 20 से अधिक प्रदेशों से  अनेक बाल कल्याण समिति  और संस्थाऐं बच्चों को सेवाधाम भेजती है, जिन्हें सुधीर भाई अपनाकर अपना नाम देते है। 

बच्चों का बैंड भी तैयार हुआ कोरोना काल में

श्रम से संस्कारित होता है जीवन जहां नैतिक शिक्षों के साथ संस्कार मिलते है। यहां के बच्चे हर प्रकार के कामो में निपुण है।  सेवाधाम का बैण्ड भी तैयार किया जा रहा है जहां बच्चे अपना कौशल प्रदर्शित कर रहे है। यहां अनेक - अनेक प्रकार के वाद्य बच्चे बजाते है। बच्चों के उन्नत जीवन के लिए एक पिता अपने सीमित संसाधनों में जो भी कुछ कर सकता है उसे भली भांति करने का प्रयत्न यहां किया जाता है। सेवाधाम में बच्चों का एक ऐसा संसार बसा हुआ है जो दुनिया में अपने आप में अलग है। यहां एक परिवार का जो वातावरण माता - पिता विहीन, घर परिवार विहिन, बेसहारे, बेघर बच्चों को मिलता है वो सामान्य रूप से मिलना एक सामान्य परिवार में भी मुश्किल होता है।

 


 10 वर्षों से जंजीरों में जकड़ा था आज गो सेवक बन गया


 यश (परिवर्तित नाम)मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण ग्राम सिरिया तहसील नलखेडा में दस वर्षों तक जंजीरों में जकडा था। 2007 में सुधीर भाई ने इसे वर्षों की कैद से मुक्ति दिलाई एवं 14 वर्ष से वह सेवाधाम में ही रहता है एवं सेवाधाम की गौशाला में प्रथम गौ सेवक के रूप में अपना जीवन यापन कर रहा है। सेवाधाम के प्रदुषण मुक्त वातावरण, आत्मीय प्रेम एवं सेवा से उसका जीवन पूर्ण रूप से बदल गया। आज वह गायों को गंभीर बांध में चराने, भूसा डालने, साफ सफाई आदि करता है एवं वह गौ सेवा करके प्रसन्न होता है। 



राजभवन मैं भी प्रस्तुति दे चुकी है सूरदास भोली


दृष्टिबाधित बालिका भोली अग्रवाल जिसका संसार में कोई नहीं था और इस निराश्रित लडकी की जवाबदारी भी कोई संस्था लेने को तैयार नहीं थी। ५ जून २००५ के दिन भोली को सेवाधाम आश्रम में प्रवेश दिया गया। भोली को सेवाधाम में रहते हुए अब 16 वर्ष होने आएँ हैं और वह सभी आश्रमवासीयों की प्रिय है। आश्रम में भ्रमण हेतु आने वाले अतिथियों का वह अपनी मधुर आवाज में स्वागत गीत गाकर सत्कार करती है और हमेशा मुस्कुराती रहती है। समस्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरूआत भोली के स्वागत गीत से होती है। मध्यप्रदेश के राजभवन में भी भोली की आवाज की गूंज चुकी है। 


नागपुर से आया जब बिस्तर पर था आज दौड़ लगाता है


तन्मय (परिवर्तित नाम) इसे नागपुर से 2002 में जब यह 3 वर्ष का था सेवाधाम आश्रम भेजा गया था।  बालक पूर्ण रूप से बिस्तर पर था। यह अपने पैरों पर खडा भी नहीं हो पाता था। आश्रम में आने के बाद उसकी फिजीयोथैरेपी, प्राकृतिक चिकित्सा एवं गौबर-गौमूत्र की मसाज से आज  दौड़ में भाग लेता है एवं अपनी दैनिक दिनचर्या स्वयं करता है। सुधीर भाई को देखते ही उनसे पिता जी पिता जी कहकर लिपट जाता है।

जिसे जंगल में फेंक कर भाग गए थे वह अब डॉक्टर बनना चाहती है

आश्रम में रहने वाली  मासूम बालिका अवंति (परिवर्तित नाम) जिसे वर्ष 2006 में  जन्म देने के बाद जंगल में फैंक गया था। बाद में सेवाधाम आश्रम ने इस बच्ची की परवरिश की। बालिका 15 वर्ष की हो चुकी है एवं कक्षा छटी में पढ़ाई कर रही है। आश्रम में रहते हुए खेलकूद व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है एवं आश्रम में निवासरत वृद्ध दादीयों की सेवा करना उसे बहुत पंसद है। उसका मन सेवा में रम गया है एवं वह आगे चलकर डाक्टर बनना चाहती है। बालिका को व्यवसायिक प्रशिक्षण हस्तशिल्प, सिरेमिक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है एवं बालिका कम्प्यूटर प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रही है।

बच्चों में देखें सुनहरा भविष्य,,

फादर्स डे पर सुधीर भाई का संदेश है कि हर कोई पिता अपने बच्चों को उनकी कमियों के साथ अपनाए और उनके अन्दर एक ऐसा सुनहरा भविष्य देखें जो राष्ट्र निर्माण के लिए इंगित करता हो। 



सेवाधाम में बच्चों और बुजुर्गों के साथ साथ अनेक प्रकार की प्रताड़ना  से प्रताड़ित महिलाओं को स्वच्छ वातावरण मिले और बच्चों को कभी यह महसूस ना हो कि उनके मां बाप नहीं है, इसलिए आश्रम में रहने वाले हैं 364 से अधिक बच्चों और बुजुर्गों को के पिता के रूप में मैंने अपना नाम शासकीय रिकॉर्ड में दर्ज करवाया है। आश्रम में मौजूद हर बुजुर्ग महिला और बच्चों की बेहद दर्दनाक कहानियां है लेकिन मेरा प्रयास यही है कि वे सब पिछली जिंदगी को भूल कर नई जिंदगी की शुरुआत करे, और इसके लिए उन्हें सौरक्षण की आवश्यकता थी, मेरे अपने बेटे की मौत के बाद मैंने यह तय किया कि मेरे संपर्क में आने वाला कोई भी निराश्रित बच्चा या बुजुर्ग यह महसूस ना करें की उसके सर पर बाप का साया नहीं है, आश्रम में रहने वाले बुजुर्ग हो या बच्चे सभी मुझे अपना पिता ही मानते हैं और पिता जैसा ही प्यार भी करते हैं

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