महापौर मधुकर वर्मा के कांग्रेस की परिषद थी, महापौर थे मधुकर वर्मा तब भी चलता था लेनदेन का खेल ,,, निगम के इंजीनियरों ने रिश्वत की राशि के लिए बना रखा था गंगाजलि फंड

 


कीर्ति राणा 

इंदौर । 

नगर निगम में परिषद चाहे भाजपा की रही या कांग्रेस की लेनदेन का खेल दशकों से चलता रहा है।जब कांग्रेस की परिषद और महापौर मधुकर वर्मा थे तब पक्ष-विपक्ष के अधिकांश पार्षदों को प्रति माह उनके कद-पद-प्रभाव के मुताबिक लिफाफे पहुंचाए जाते थे।इसकी एक वजह किसी तरह कांग्रेस परिषद को बनाए रखना भी था।इसके लिए निगम के इंजीनियरों द्वारा घोषित रूप से गंगाजलि फंड के लिए राशि एकत्र की जाती थी।हालांकि जब यह गंगाजलि फंड सार्वजनिक रूप से चर्चा का कारण बनने लगा तो महापौर को भोपाल बुलाकर (इंदौर के शेडो सीएम कहे जाने वाले) वरिष्ठ नेता (स्व) महेश जोशी ने फटकार लगाई थी। नतीजा यह हुआ कि तीन चार महीने बाद ही फंड के तहत राशि एकत्र की जाने वाली प्रक्रिया बंद करना पड़ी थी।

लक्ष्मण रेखा वाले बहुमत की कांग्रेस परिषद के महापौर बने थे मधुकर वर्मा, जिस तरह प्रधानमंत्री मोदी चाय वाले के रूप में प्रचारित रहे वैसे ही मधुकर वर्मा पान वाले के रूप में पहचाने जाते थे।वे छल छद्म की राजनीति से दूर थे, राजवाड़ा पर कोहिनूर होटल के बाहर उनकी पान की दुकान थी।1994 में नगर निगम के चुनाव नवंबर में हुए। इसी बीच संविधान में दो संशोधन (74, 75वां) हुआ। एक नगर निगम में महापौर पद आरक्षित और दूसरा संशोधन पंचायत चुनाव आधारित था।इंदौर नगर निगम के लिए पिछड़ा वर्ग महापौर की लाटरी निकली, गांधीभवन से लेकर भोपाल में महेश जोशी के बंगले पर चली राजनीतिक उठापटक के बाद पिछड़ा वर्ग से निर्वाचित तीन पार्षदों मधुकर वर्मा, भल्लू यादव और मोहन ढाकोनिया महापौर पद के दावेदार थे।गांधीभवन में हुई बैठक में तीनों के लिए पार्षदों द्वारा किए मतदान में मधुकर वर्मा को सर्वाधिक 20 वोट मिलने पर उनका महापौर के रूप में चयन किया गया।तब परिषद में कुल पार्षदों की संख्या 69 रहती थी।कांग्रेस ने किसी को अधिकृत पंजा चुनाव चिह्न नहीं देकर चुनाव फ्री फॉर ऑल कर दिया था।कांग्रेस विचारधारा वाले 34, एक कम्युनिस्ट पार्टी के सोहन लाल शिंदे और एक भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर बागी हुए रमेश गागरे व बाकी पार्षद भाजपा के जीते थे।कांग्रेस ने तलवार की धार पर चलने वाला बहुमत सोहनलाल शिंदे और विष्णु उस्ताद की मदद से रमेश गागरे को उप महापौर बनाने का वादा कर के जुटा लिया था।चूंकि बाकी (कांग्रेस) पार्षद भी अपने दमखम पर फ्रीफॉर ऑल में चुनाव जीत कर आए थे इसलिए बातबात में आंखें दिखाना, अपने वार्ड में हर तरह के काम की मंजूरी का दबाव बनाते रहते थे। 

धनबल का रास्ता पसंद आया सभी पार्षदों को  

ऐसे सभी पार्षदों को धन बल से अपने साथ बनाए रखने के लिए धन बल का ही आसान रास्ता था। नगर निगम के इंजीनियर भी परेशान थे हर पार्षद के अनैतिक दबाव को लेकर।तब निगम के एक प्रभावशाली इंजीनियर हर तरह की समस्या का आसान हल खोजने में माहिर माने जाते थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता-पूर्व मंत्री के भांजे होने से भी उनका इंदौर से भोपाल तक रुतबा था। 

हर रोज पार्षदों की डिमांड पूरी करने की अपेक्षा यह रास्ता निकाला गया कि निगम के जितने कारय ठेकेदारों से कराए जाते है, विभागों द्वारा जो सामग्री खरीदी जाती हैं, किराए के टैंकरों से जल वितरण किया जाता है, नक्षे आदि पास किए जाने संबंधी अन्य जितने भी कार्यों में कमीशन मिलता है  इंजीनियर ऐसी सारी राशि एकमुश्त हर माह सौंप देंगे। इस राशि को जुटाने, मधुकर वर्मा के मार्गदर्शक नेता तक पहुंचाने का जिम्मा इन्हीं इंजीनियर ने संभाला था।हालांकि गंगा नदी को पवित्रतम माना जाता है लेकिन दो नंबर वाली राशि को नाम दिया गया था ‘गंगाजलि फंड’ का। यह राशि पंढरीनाथ मार्ग पर नियमित बैठक करने वाले वरिष्ठ नेता तक प्रतिमाह पहुंचाई जाती थी। वहीं से लिफाफे तैयार होते और कांग्रेस के साथ ही कतिपय भाजपा पार्षदों को भी गंगाजलि फंड का प्रसाद ले जाने के लिए फोन किए जाते थे। जिस पार्षद की जितनी ऊंची आवाज जो निगम के विभिन्न विभागों में चलने वाली धांधली पर नजर रखने में जितना माहिर या कांग्रेस में बहुमत जैसे संकट को भुनाने में जितना चतुर कई बार उसका लिफाफा उतना अधिक वजनदार हो जाता था।

जिनके कंधों पर टिकी थी परिषद

उनकी फरमाइशें भी कम नहीं थी 

कांग्रेस की परिषद चूंकि गागरे और शिंदे के कंधों पर टिकी थी इसलिए गंगाजलि फंड के अलावा भी उप महापौर और इनकी अलग से भी फरमाइश पूरी करना अधिकारियों की मजबूरी रहती थी। गंगाजलि फंड की यह व्यवस्था दो तीन महीने में ही इसलिए चरमरा गई कि कम अधिक राशि को लेकर कुछ पार्षदों का असंतोष सार्वजनिक होने से निगम गलियारों से लेकर मीडिया तक में गंगाजलि फंड के किस्सों के  चटखारे लिए जाने लगे। इससे कांग्रेस नेताओं की किरकिरी भी होने लगी। इस फंड की जानकारी लगने पर महेश जोशी ने मधुकर वर्मा सहित पार्टी के अन्य नेताओं को भोपाल बुलाकर खूब फटकारा।गंगाजलि फंड राशि के मासिक वितरण की व्यवस्था तो समाप्त हो गई लेकिन पार्षदों, स्टैंडिंग कमेटी, अपील समिति सहित अन्य समितियों के अध्यक्ष-पार्षदों ने फाइलों पर हस्ताक्षर करने, निर्माण कार्यों की मंजूरी, भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देने जैसे काम को अतिरिक्त कमाई का जरिया बना लिया, यही सब आज भी चल रहा है। 

डायरी की असलियत शायद ही सामने आए

लोकायुक्त पुलिस ने जनकार्य विभाग अधीक्षक सक्सेना और महिला कर्मचारी हिमानी को25 हजार की  रिश्वत मामले में दो दिन पहले रंगे हाथों पकड़ा जरूर है लेकिन जांच इन तक ही सिमट कर रह जाना तय है, जैसा हनी ट्रेप मामले को लेकर आशंका व्यक्त की जाती रही है।सक्सेना की अलमारी वाले दराज से दस लाख नकद सहित मिली डायरी की असलियत सार्वजनिक होना इसलिए भी संभव नहीं लगता कि सक्सेना तो एक कड़ी है। 



इस कांड में निगम अधिकारियों से लेकर पार्षद और महापौर रहे नेताओं के नाम तो निगम में यूं ही गूंज रहे हैं जबकि डायरी का सच सामने नहीं आया है।यदि डायरी के पन्नों पर कोडवर्ड में भी वरिष्ठ अधिकारियों-नेताओं के नाम होंगे तो ये ही सारे लोग खुद को पाक साफ दर्शाने में  सक्सेना को बचाने के लिए सक्रिय हो जाएंगे।

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