प्राचीन जन्तुविज्ञान है मृगपक्षीशास्त्र- के वरलक्ष्मी* शास्त्र का अध्ययन हमें आधुनिक विज्ञान से जोड़े रखता है।

 



दिनाङ्क 12/10/2021 को महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के संस्कृत साहित्य एवं दर्शन विभाग द्वारा मृगपक्षीशास्त्र विषय पर विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता संस्कृत अकादमी हैदराबाद की उपनिदेशिका प्रो के वरलक्ष्मी ने अपने व्याख्यान में कहा कि हंसदेव विरचित *मृगपक्षिशास्त्रम्* प्राचीन जन्तुविज्ञान (एन्सिएन्ट जूलाॅजी) का एक अप्रतिम ग्रन्थ है। इसमें पशुपक्षियों के लक्षणों और चेष्टाओं का सूक्ष्म वर्णन है। इस ग्रन्थ में हाथी की तेरह तथा सिंह की पाँच जातियों की चर्चा की गयी है। मृगेन्द्र, पंचानन आदि नाम कोष ग्रन्थों में सिंह के पर्याय रूप में मिलते हैं, किन्तु ये सिंह की विभिन्न प्रजातियाँ हैं। उन्होंने मृगपक्षीशास्त्र के पशु पक्षियों के वर्गीकरण की तुलना आधुनिक जन्तुविज्ञान के वर्गीकरण से करते हुए बताया कि आज मेमल्स में मनुष्य को भी गिना जाता, किन्तु भारतीय मत मृग के अन्तर्गत पशुओं का ही अध्ययन करता था। इस ग्रन्थ से भारतीयों के सूक्ष्मचिन्तन और उनकी वैज्ञानिक मेधा के विषय में ज्ञान प्राप्त होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय प्रो विजयकुमार सी.जी. ने कहा कि संस्कृत के क्षेत्र में इस तरह के ग्रन्थों के सम्पादन व प्रकाशन की नितान्त आवश्यकता है। इस तरह के शास्त्र का अध्ययन हमें आधुनिक विज्ञान से जोड़े रखता है। आज की पीढ़ी हमारे पूर्वजों के उन्नत विज्ञान से अपरिचित है। ऐसे व्याख्यान न केवल उन्हें अपनी परम्परा पर गौरव का अवसर देते हैं, बल्कि नवीन अनुसन्धान हेतु प्रेरणा भी देते हैं। कार्यक्रम का संयोजन संस्कृत साहित्य एवं दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ तुलसीदास परौहा का रहा। इस कार्यक्रम में निदेशक डाॅ मनमोहन उपाध्याय, डाॅ अखिलेशकुमार द्विवेदी, डाॅ उपेन्द्र भार्गव, डाॅ संकल्प मिश्र, डाॅ शुभम् शर्मा  सहित विश्वविद्यालय एवं सम्बद्ध महाविद्यालयों के प्राचार्य, अध्यापक तथा छात्र जुड़े। तन्त्र संयोजन डाॅ विनोदकुमार पाण्डेय का रहा।

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